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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-1 हिन्दी - साहित्यशास्त्र और हिन्दी आलोचना

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :200
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2784
आईएसबीएन :0

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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-1 हिन्दी - साहित्यशास्त्र और हिन्दी आलोचना- सरल प्रश्नोत्तर

काव्य हेतु

प्रश्न- काव्य हेतु पर भारतीय विचारकों के मतों की समीक्षा कीजिए।

अथवा
काव्य हेतुओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
काव्य हेतु की विवेचना करते हुये प्रतिभा का महत्व प्रतिपादित कीजिये।

उत्तर -

हेतु का तात्पर्य होता है कि कारण। काव्य हेतु उन तत्व को कहते हैं जिनके कारण काव्य सृजन सम्भव हो पाता है। साधारण आदमी भी संवेदनशील विचारशील हो सकता है, लेकिन वह अपनी अनुभूति को छन्दबद्ध नहीं कर सकता जैसाकि कवि कर लेता है क्योंकि हर आदमी के अन्दर वे तत्व या कारण नहीं विद्यमान होते हैं जो काव्य सृजन के लिए उत्तरदायी होते हैं। इस सन्दर्भ में डॉ0 कृष्णदेव झारी का विचार बड़ा संगत प्रतीत होता है। डॉक्टर साहब लिखते हैं कि-

"साधारण मानव भी विचारशील और संवेदनशील होता है, किन्तु वह अपनी अनुभूति छन्दोबद्ध करके संवेद्य नहीं बना सकता, जैसाकि काव्य-सर्जन के द्वारा कर सकता है। इसका कारण यही है कि प्रत्येक व्यक्ति में काव्य-रचना के हेतुओं का उतना विकास नहीं हो पाता, जितना कि कवे- कर्म के लिए अपेक्षित है। जो कवि काव्य-रचना के हेतु कहे जाने वाले साधनों से जितना अधिक सम्पन्न होता है, उसकी कविता उतनी ही अधिक समर्थ होती है।'

काव्य हेतु के सम्बन्ध में संस्कृत के काव्यशास्त्रियों ने अपने ढंग से विचार किया है। आचार्य दण्डी काव्य हेतुओं की ओर संकेत करते हुए लिखते हैं-

नैर्गिकी च प्रतिभा श्रुतञ्च बहु निर्मलम्।
अमन्दश्चाभियोगश्च कारणं काव्य- सम्पदः ॥

अर्थात् जन्मजात प्रतिभा, लोकशास्त्र ज्ञान तथा अनवरत अभ्यास ही काव्य हेतु हैं। काव्य हेतु के सन्दर्भ में आचार्य मम्मट का विचार है कि-

शक्तिर्निपुणता लोक-काव्यशास्त्रयवेक्षणात्।
काव्यज्ञ-शिक्षयाभ्यास इति हेतुस्तदुद्भवे ॥

अर्थात् शक्ति, लोक, काव्यशास्त्र आदि के अवेक्षण से प्राप्त निपुणता तथा काव्यमर्मज्ञों से प्राप्त शिक्षा के माध्यम से किया जाने वाला अभ्यास इन तीनों के समन्वित रूप को काव्य हेतु कहते हैं।

आचार्य कुंतक के अनुसार - काव्य हेतु तीन होते हैं- शक्ति, व्युत्पत्ति और अभ्यास।

तस्यासारनिरासात् सारग्रहणाच्चचारूपः करणे।
मितयमिद व्याप्रियते शक्तिवर्युत्पत्तिरभ्यासः

हिन्दी आचार्यों ने संस्कृत के आचार्यों का ही अनुकरण किया है। काव्य-हेतु के विषय में अपना कोई मौलिक चिन्तन नहीं है। आचार्य श्रीपति लिखते हैं कि-

शक्ति निपुणता लोकमत वितपति अरु अभ्यास।

अरु प्रतिभा ते होत है, ताको ललित प्रकास ॥

आचार्य सुरति मिश्र के अनुसार-

कारण देव प्रसाद जिहिं शक्ति कहत सब कोई।
वितपति अरु अभ्यास मिलि, त्रय बिनु काव्य न होइ ॥

उल्लिखित समस्त आचार्यों के मतों की छानबीन करने पर हमारे सामने चार ऐसे काव्य हेतु उभर कर आते हैं जिन पर सभी आचार्यों ने सहमति प्रकट की है। ये काव्य हेतु हैं प्रतिभा, व्युत्पत्ति, अभ्यास और शक्ति। ये चारों काव्य-हेतु व्याख्येय हैं। इनकी व्याख्या के क्रम में सबसे पहले हम 'प्रतिभा' पर विचार करेंगे।

'प्रतिभा' : आचार्य दण्डी ने 'प्रतिभा' को एक प्रमुख काव्य हेतु के रूप में मान्यता दी है। प्रश्न उठता है कि प्रतिभा क्या है। भट्ट तौत लिखते हैं कि- 

प्रतिभा, मनुष्य की एक जन्मजात दैवी शक्ति है जिससे उसके अन्तर्गत नवीन वस्तुओं की रचना की स्फूर्ति जाग्रत होती है।

बुद्धिस्तात्कालिकी ज्ञेया मतिरागामिगोचरा।
प्रज्ञा नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा मता ॥  -(भट्ट तौत)

कुछ विद्वानों ने 'प्रतिभा' को ही 'शक्ति' कहा है। आचार्य दण्डी 'काव्यादर्श' में लिखते हैं कि जिसके अन्दर 'प्रतिभा' नहीं होती वह भी यदि यत्न, सत्संग और अध्ययन करे तो वाणी का कृपापात्र हो सकता है। लेकिन दण्डी से पूरी तरह सहमत नहीं हुआ जा सकता क्योंकि यत्न, श्रवण सत्संग आदि से वाणी जिनके ऊपर कृपा करती हैं उनमें प्रतिभा का बीज चाहें क्षीण रूप में ही सही विद्यमान अवश्य रहता है। आचार्य जयदेव ज्ञान और अभ्यास को जल और मिट्टी तथा 'प्रतिभा' को बीज के रूप में स्वीकार करते हुए लिखते हैं-

प्रतिभैव श्रुताभ्याससहिता कवितां प्रति।
हेतुर्मृदम्बुसम्बद्ध बीजोत्पत्तिर्लतामिव ॥

ज्ञान और अभ्यास प्रतिभा-रूप बीज को अंकुरित करने के लिए मिट्टी और जल के तुल्य हैं। अतः प्रमुख कारण प्रतिभा है। आचार्य हेमचन्द्र ने अपने ग्रन्थ काव्यानुशासन में और भी निश्चित शब्दों में इसी मत की पुष्टि की है। उनका कथन है-

प्रतिभैव च कवीनां काव्यकारणकारणम्।
व्युत्पत्त्यभ्यासौ तस्या एवं संस्कारकारकौ न तु काव्यहेतू ॥

अभ्यास अभ्यास की गणना प्रमुख काव्य हेतुओं में नहीं की जाती है, लेकिन यह एक आवश्यक काव्य हेतु अवश्य है। प्रतिभा से युक्त कवि निरन्तर अभ्यास द्वारा ही उच्चकोटि का कवि बन जाता है। अभ्यास के महत्व को सामान्य जनों में भी स्वीकारा गया है। लोग अक्सर कहते हैं

करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान
रसरी आवत जात ते सिल पर पड़त निशान

आचार्य भामह, वामन, आनन्दवर्धन एवं अभिनवगुप्त आदि सभी आचार्यों ने अभ्यास के महत्त्व को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष, किसी-न-किसी रूप में अवश्य स्वीकार किया है। वास्तव में अभ्यास कवि-कर्म के लिए वश्यक है। निरन्तर अभ्यास से कवि की आत्माभिव्यंजना एवं भावाभिव्यक्ति में और अधिक प्रांजलता, धुर्य एवं प्रभावोत्पादकता का आविर्भाव हो जाता है। अभ्यास के द्वारा ही गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास, पन्द निराला और कवियों ने अच्छे-अच्छे ग्रन्थों का प्रणयन किया है।

व्युत्पत्ति - आचार्यों ने व्युत्पत्ति को भी काव्य हेतु के रूप में मान्यता दी है। व्युत्पत्ति का तात्पर्य ता है - पाण्डित्य आचार्य भामह ने व्युत्पत्ति को परिभाषित किया है कि-

छन्दोव्याकरण- कलालोकस्थिति-पदपदार्थ-विज्ञानात्।
युक्तायुक्त विवेको व्युत्पत्तिरिदिं समासेन ॥

आचार्य मम्मट व्युत्पत्ति के लिए 'निपुणता' शब्द का प्रयोग करते हुए कहते हैं कि यह निपुणता चराचर जगत को देखने तथा शास्त्र आदि के अध्ययन से प्राप्त होती है

'शक्तिर्निपुणता -लोकशास्त्रकाव्याद्यवेक्षणात्।

इस तरह व्युत्पत्ति का महत्व अपने आप में पूर्णतया स्पष्ट है। कोई भी कवि केवल प्रतिभा के बल पर काव्य-सृजन नहीं कर सकता, बल्कि इसके लिए उसे श्रुति, स्मृति, पुराण, लोक व्यवहार आदि का ज्ञान होना भी आवश्यक है। राजशेखर ने व्युत्पत्ति को बहुज्ञता शब्द दिया है। बहुज्ञता के कारण ही काव्यकर्ता के विचार प्रामाणिक बन पाते हैं और तभी वह उचितानुचित का विवेक रख सकता है। ऐसी स्थिति में ही वह सामाजिक को क्रान्तिकारी चेतना दे सकता है, अन्यथा नहीं। राजशेखर ने प्रतिभा और व्युत्पत्ति दोनों को श्रेयस्कर माना है। क्योंकि काव्य-प्रतिभा तो जन्मजात हो सकती है, किन्तु उसका समुचित विकास व्युत्पत्ति से ही सम्भव है, अन्यथा काव्य-सृजन संभव नहीं। इस तरह प्रतिभा और व्युत्पत्ति एक-दूसरे के पूरक हैं, दोनों समवेत रूप में ही काव्य-सृजन में योग देते हैं।

शक्ति - कुछ विद्वानों ने 'प्रतिभा' को ही शक्ति कहा है। आचार्य रुद्रट ने शक्ति के दो भेद बताते हैं-

(1) सहजा
(2) उत्पाध।

सहजा ईश्वर प्रदत्त और पूर्व संस्कारों द्वारा संचित जन्मजात शक्ति है। उत्पाधा शास्त्र, लोकानुभव सत्संग, यत्न आदि से प्राप्त होती है। प्रतिभा और शक्ति परस्पर एक-दूसरे के पर्याय है। शक्ति अलग से कोई हेतु नहीं है।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि प्रमुख काव्य हेतु तीन हैं- प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास। प्रतिभा से अलग शक्ति कोई विशेष महत्व की नहीं है। इन्हीं तीनों की विद्यमानता में काव्य-सृजन की प्रक्रिया सम्भव हो पाती है।

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    अनुक्रम

  1. प्रश्न- काव्य के प्रयोजन पर प्रकाश डालिए।
  2. प्रश्न- भारतीय आचार्यों के मतानुसार काव्य के प्रयोजन का प्रतिपादन कीजिए।
  3. प्रश्न- हिन्दी आचायों के मतानुसार काव्य प्रयोजन किसे कहते हैं?
  4. प्रश्न- पाश्चात्य मत के अनुसार काव्य प्रयोजनों पर विचार कीजिए।
  5. प्रश्न- हिन्दी आचायों के काव्य-प्रयोजन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए?
  6. प्रश्न- आचार्य मम्मट के आधार पर काव्य प्रयोजनों का नाम लिखिए और किसी एक काव्य प्रयोजन की व्याख्या कीजिए।
  7. प्रश्न- भारतीय आचार्यों द्वारा निर्दिष्ट काव्य लक्षणों का विश्लेषण कीजिए
  8. प्रश्न- हिन्दी के कवियों एवं आचार्यों द्वारा प्रस्तुत काव्य-लक्षणों में मौलिकता का अभाव है। इस मत के सन्दर्भ में हिन्दी काव्य लक्षणों का निरीक्षण कीजिए 1
  9. प्रश्न- पाश्चात्य विद्वानों द्वारा बताये गये काव्य-लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
  10. प्रश्न- आचार्य मम्मट द्वारा प्रदत्त काव्य-लक्षण की विवेचना कीजिए।
  11. प्रश्न- रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्' काव्य की यह परिभाषा किस आचार्य की है? इसके आधार पर काव्य के स्वरूप का विवेचन कीजिए।
  12. प्रश्न- महाकाव्य क्या है? इसके सर्वमान्य लक्षण लिखिए।
  13. प्रश्न- काव्य गुणों की चर्चा करते हुए माधुर्य गुण के लक्षण स्पष्ट कीजिए।
  14. प्रश्न- मम्मट के काव्य लक्षण को स्पष्ट करते हुए उठायी गयी आपत्तियों को लिखिए।
  15. प्रश्न- 'उदात्त' को परिभाषित कीजिए।
  16. प्रश्न- काव्य हेतु पर भारतीय विचारकों के मतों की समीक्षा कीजिए।
  17. प्रश्न- काव्य के प्रकारों का विस्तृत उल्लेख कीजिए।
  18. प्रश्न- स्थायी भाव पर एक टिप्पणी लिखिए।
  19. प्रश्न- रस के स्वरूप का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
  20. प्रश्न- काव्य हेतु के रूप में निर्दिष्ट 'अभ्यास' की व्याख्या कीजिए।
  21. प्रश्न- 'रस' का अर्थ स्पष्ट करते हुए उसके अवयवों (भेदों) का विवेचन कीजिए।
  22. प्रश्न- काव्य की आत्मा पर एक निबन्ध लिखिए।
  23. प्रश्न- भारतीय काव्यशास्त्र में आचार्य ने अलंकारों को काव्य सौन्दर्य का भूल कारण मानकर उन्हें ही काव्य का सर्वस्व घोषित किया है। इस सिद्धान्त को स्वीकार करने में आपकी क्या आपत्ति है? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
  24. प्रश्न- काव्यशास्त्रीय सम्प्रदायों के महत्व को उल्लिखित करते हुए किसी एक सम्प्रदाय का सम्यक् विश्लेषण कीजिए?
  25. प्रश्न- अलंकार किसे कहते हैं?
  26. प्रश्न- अलंकार और अलंकार्य में क्या अन्तर है?
  27. प्रश्न- अलंकारों का वर्गीकरण कीजिए।
  28. प्रश्न- 'तदोषौ शब्दार्थों सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि कथन किस आचार्य का है? इस मुक्ति के आधार पर काव्य में अलंकार की स्थिति स्पष्ट कीजिए।
  29. प्रश्न- 'काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते' कथन किस आचार्य का है? इसका सम्बन्ध किस काव्य-सम्प्रदाय से है?
  30. प्रश्न- हिन्दी में स्वीकृत दो पाश्चात्य अलंकारों का उदाहरण सहित परिचय दीजिए।
  31. प्रश्न- काव्यालंकार के रचनाकार कौन थे? इनकी अलंकार सिद्धान्त सम्बन्धी परिभाषा को व्याख्यायित कीजिए।
  32. प्रश्न- हिन्दी रीति काव्य परम्परा पर प्रकाश डालिए।
  33. प्रश्न- काव्य में रीति को सर्वाधिक महत्व देने वाले आचार्य कौन हैं? रीति के मुख्य भेद कौन से हैं?
  34. प्रश्न- रीति सिद्धान्त की अन्य भारतीय सम्प्रदायों से तुलना कीजिए।
  35. प्रश्न- रस सिद्धान्त के सूत्र की महाशंकुक द्वारा की गयी व्याख्या का विरोध किन तर्कों के आधार पर किया गया है? स्पष्ट कीजिए।
  36. प्रश्न- ध्वनि सिद्धान्त की भाषा एवं स्वरूप पर संक्षेप में विवेचना कीजिए।
  37. प्रश्न- वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ ध्वनि में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
  38. प्रश्न- 'अभिधा' किसे कहते हैं?
  39. प्रश्न- 'लक्षणा' किसे कहते हैं?
  40. प्रश्न- काव्य में व्यञ्जना शक्ति पर टिप्पणी कीजिए।
  41. प्रश्न- संलक्ष्यक्रम ध्वनि को सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
  42. प्रश्न- दी गई पंक्तियों में में प्रयुक्त ध्वनि का नाम लिखिए।
  43. प्रश्न- शब्द शक्ति क्या है? व्यंजना शक्ति का सोदाहरण परिचय दीजिए।
  44. प्रश्न- वक्रोकित एवं ध्वनि सिद्धान्त का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
  45. प्रश्न- कर रही लीलामय आनन्द, महाचिति सजग हुई सी व्यक्त।
  46. प्रश्न- वक्रोक्ति सिद्धान्त व इसकी अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
  47. प्रश्न- वक्रोक्ति एवं अभिव्यंजनावाद के आचार्यों का उल्लेख करते हुए उसके साम्य-वैषम्य का निरूपण कीजिए।
  48. प्रश्न- वर्ण विन्यास वक्रता किसे कहते हैं?
  49. प्रश्न- पद- पूर्वार्द्ध वक्रता किसे कहते हैं?
  50. प्रश्न- वाक्य वक्रता किसे कहते हैं?
  51. प्रश्न- प्रकरण अवस्था किसे कहते हैं?
  52. प्रश्न- प्रबन्ध वक्रता किसे कहते हैं?
  53. प्रश्न- आचार्य कुन्तक एवं क्रोचे के मतानुसार वक्रोक्ति एवं अभिव्यंजना के बीच वैषम्य का निरूपण कीजिए।
  54. प्रश्न- वक्रोक्तिवाद और वक्रोक्ति अलंकार के विषय में अपने विचार व्यक्त कीजिए।
  55. प्रश्न- औचित्य सिद्धान्त किसे कहते हैं? क्षेमेन्द्र के अनुसार औचित्य के प्रकारों का वर्गीकरण कीजिए।
  56. प्रश्न- रसौचित्य किसे कहते हैं? आनन्दवर्धन द्वारा निर्धारित विषयों का उल्लेख कीजिए।
  57. प्रश्न- गुणौचित्य तथा संघटनौचित्य किसे कहते हैं?
  58. प्रश्न- प्रबन्धौचित्य के लिये आनन्दवर्धन ने कौन-सा नियम निर्धारित किया है तथा रीति औचित्य का प्रयोग कब करना चाहिए?
  59. प्रश्न- औचित्य के प्रवर्तक का नाम और औचित्य के भेद बताइये।
  60. प्रश्न- संस्कृत काव्यशास्त्र में काव्य के प्रकार के निर्धारण का स्पष्टीकरण दीजिए।
  61. प्रश्न- काव्य के प्रकारों का विस्तृत उल्लेख कीजिए।
  62. प्रश्न- काव्य गुणों की चर्चा करते हुए माधुर्य गुण के लक्षण स्पष्ट कीजिए।
  63. प्रश्न- काव्यगुणों का उल्लेख करते हुए ओज गुण और प्रसाद गुण को उदाहरण सहित परिभाषित कीजिए।
  64. प्रश्न- काव्य हेतु के सन्दर्भ में भामह के मत का प्रतिपादन कीजिए।
  65. प्रश्न- ओजगुण का परिचय दीजिए।
  66. प्रश्न- काव्य हेतु सन्दर्भ में अभ्यास के महत्व पर प्रकाश डालिए।
  67. प्रश्न- काव्य गुणों का संक्षित रूप में विवेचन कीजिए।
  68. प्रश्न- शब्द शक्ति को स्पष्ट करते हुए अभिधा शक्ति पर प्रकाश डालिए।
  69. प्रश्न- लक्षणा शब्द शक्ति को समझाइये |
  70. प्रश्न- व्यंजना शब्द-शक्ति पर प्रकाश डालिए।
  71. प्रश्न- काव्य दोष का उल्लेख कीजिए।
  72. प्रश्न- नाट्यशास्त्र से क्या अभिप्राय है? भारतीय नाट्यशास्त्र का सामान्य परिचय दीजिए।
  73. प्रश्न- नाट्यशास्त्र में वृत्ति किसे कहते हैं? वृत्ति कितने प्रकार की होती है?
  74. प्रश्न- अभिनय किसे कहते हैं? अभिनय के प्रकार और स्वरूप पर प्रकाश डालिए।
  75. प्रश्न- रूपक किसे कहते हैं? रूप के भेदों-उपभेंदों पर प्रकाश डालिए।
  76. प्रश्न- कथा किसे कहते हैं? नाटक/रूपक में कथा की क्या भूमिका है?
  77. प्रश्न- नायक किसे कहते हैं? रूपक/नाटक में नायक के भेदों का वर्णन कीजिए।
  78. प्रश्न- नायिका किसे कहते हैं? नायिका के भेदों पर प्रकाश डालिए।
  79. प्रश्न- हिन्दी रंगमंच के प्रकार शिल्प और रंग- सम्प्रेषण का परिचय देते हुए इनका संक्षिप्त विवेचन कीजिए।
  80. प्रश्न- नाट्य वृत्ति और रस का सम्बन्ध बताइए।
  81. प्रश्न- वर्तमान में अभिनय का स्वरूप कैसा है?
  82. प्रश्न- कथावस्तु किसे कहते हैं?
  83. प्रश्न- रंगमंच के शिल्प का संक्षिप्त विवेचन कीजिए।
  84. प्रश्न- अरस्तू के 'अनुकरण सिद्धान्त' को प्रतिपादित कीजिए।
  85. प्रश्न- अरस्तू के काव्यं सिद्धान्त का विवेचन कीजिए।
  86. प्रश्न- त्रासदी सिद्धान्त पर प्रकाश डालिए।
  87. प्रश्न- चरित्र-चित्रण किसे कहते हैं? उसके आधारभूत सिद्धान्त बताइए।
  88. प्रश्न- सरल या जटिल कथानक किसे कहते हैं?
  89. प्रश्न- अरस्तू के अनुसार महाकाव्य की क्या विशेषताएँ हैं?
  90. प्रश्न- "विरेचन सिद्धान्त' से क्या तात्पर्य है? अरस्तु के 'विरेचन' सिद्धान्त और अभिनव गुप्त के 'अभिव्यंजना सिद्धान्त' के साम्य को स्पष्ट कीजिए।
  91. प्रश्न- कॉलरिज के काव्य-सिद्धान्त पर विचार व्यक्त कीजिए।
  92. प्रश्न- मुख्य कल्पना किसे कहते हैं?
  93. प्रश्न- मुख्य कल्पना और गौण कल्पना में क्या भेद है?
  94. प्रश्न- वर्ड्सवर्थ के काव्य-भाषा विषयक सिद्धान्त पर प्रकाश डालिये।
  95. प्रश्न- 'कविता सभी प्रकार के ज्ञानों में प्रथम और अन्तिम ज्ञान है। पाश्चात्य कवि वर्ड्सवर्थ के इस कथन की विवेचना कीजिए।
  96. प्रश्न- वर्ड्सवर्थ के कल्पना सम्बन्धी विचारों का संक्षेप में विवेचन कीजिए।
  97. प्रश्न- वर्ड्सवर्थ के अनुसार काव्य प्रयोजन क्या है?
  98. प्रश्न- वर्ड्सवर्थ के अनुसार कविता में छन्द का क्या योगदान है?
  99. प्रश्न- काव्यशास्त्र की आवश्यकता का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
  100. प्रश्न- रिचर्ड्स का मूल्य-सिद्धान्त क्या है? स्पष्ट रूप से विवेचन कीजिए।
  101. प्रश्न- रिचर्ड्स के संप्रेषण के सिद्धान्त पर प्रकाश डालिए।
  102. प्रश्न- रिचर्ड्स के अनुसार सम्प्रेषण का क्या अर्थ है?
  103. प्रश्न- रिचर्ड्स के अनुसार कविता के लिए लय और छन्द का क्या महत्व है?
  104. प्रश्न- 'संवेगों का संतुलन' के सम्बन्ध में आई. ए. रिचर्डस् के क्या विचारा हैं?
  105. प्रश्न- आई.ए. रिचर्ड्स की व्यावहारिक आलोचना की समीक्षा कीजिये।
  106. प्रश्न- टी. एस. इलियट के प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। इसका हिन्दी साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा है?
  107. प्रश्न- सौन्दर्य वस्तु में है या दृष्टि में है। पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र के अनुसार व्याख्या कीजिए।
  108. प्रश्न- हिन्दी आलोचना के उद्भव तथा विकासक्रम पर एक निबन्ध लिखिए।
  109. प्रश्न- स्वच्छंदतावाद से क्या तात्पर्य है? उसका उदय किन परिस्थितियों में हुआ?
  110. प्रश्न- साहित्य में मार्क्सवादी समीक्षा का क्या अभिप्राय है? विवेचना कीजिए।
  111. प्रश्न- आधुनिक साहित्य में मनोविश्लेषणवाद के योगदान की विवेचना कीजिए।
  112. प्रश्न- आलोचना की पारिभाषा एवं उसके स्वरूप पर प्रकाश डालिए।
  113. प्रश्न- हिन्दी की मार्क्सवादी आलोचना पर प्रकाश डालिए।
  114. प्रश्न- हिन्दी आलोचना पद्धतियों को बताइए। आलोचना के प्रकारों का भी वर्णन कीजिए।
  115. प्रश्न- स्वच्छंदतावाद के अर्थ और स्वरूप पर प्रकाश डालिए।
  116. प्रश्न- मनोविश्लेषवाद की समीक्षा दीजिए।
  117. प्रश्न- मार्क्सवाद की दृष्टिकोण मानवतावादी है इस कथन के आलोक में मार्क्सवाद पर विचार कीजिए?
  118. प्रश्न- नयी समीक्षा पद्धति पर लेख लिखिए।
  119. प्रश्न- विखंडनवाद को समझाइये |
  120. प्रश्न- यथार्थवाद का अर्थ और परिभाषा देते हुए यथार्थवाद के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
  121. प्रश्न- कलावाद किसे कहते हैं? कलावाद के उद्भव और विकास पर प्रकाश डालिए।
  122. प्रश्न- बिम्बवाद की अवधारणा, विचार और उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
  123. प्रश्न- प्रतीकवाद के अर्थ और परिभाषा का वर्णन कीजिए।
  124. प्रश्न- संरचनावाद में आलोचना की किस प्रविधि का विवेचन है?
  125. प्रश्न- विखंडनवादी आलोचना का आशय स्पष्ट कीजिए।
  126. प्रश्न- उत्तर-संरचनावाद के उद्भव और विकास को स्पष्ट कीजिए।
  127. प्रश्न- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की काव्य में लोकमंगल की अवधारणा पर प्रकाश डालिए।
  128. प्रश्न- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना दृष्टि "आधुनिक साहित्य नयी मान्यताएँ" का उल्लेख कीजिए।
  129. प्रश्न- "मेरी साहित्यिक मान्यताएँ" विषय पर डॉ0 नगेन्द्र की आलोचना दृष्टि पर विचार कीजिए।
  130. प्रश्न- डॉ0 रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि 'तुलसी साहित्य में सामन्त विरोधी मूल्य' का मूल्यांकन कीजिए।
  131. प्रश्न- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की आलोचनात्मक दृष्टि पर प्रकाश डालिए।
  132. प्रश्न- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी की साहित्य की नई मान्यताएँ क्या हैं?
  133. प्रश्न- रामविलास शर्मा के अनुसार सामंती व्यवस्था में वर्ण और जाति बन्धन कैसे थे?

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