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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-1 हिन्दी - साहित्यशास्त्र और हिन्दी आलोचना

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :200
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2784
आईएसबीएन :0

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बीए सेमेस्टर-5 पेपर-1 हिन्दी - साहित्यशास्त्र और हिन्दी आलोचना- सरल प्रश्नोत्तर

अध्याय - 6  
हिन्दी आलोचना का इतिहास तथा सैद्धांतिकी

हिन्दी आलोचना का विकास

प्रश्न- हिन्दी आलोचना के उद्भव तथा विकासक्रम पर एक निबन्ध लिखिए।

अथवा
हिन्दी आलोचना के उद्भव और विकास पर प्रकाश डालिए।
अथवा
हिन्दी आलोचना के विकास अपना मत विस्तार से व्यक्त कीजिए।

उत्तर -

आलोचना शब्द संस्कृत की लुच धातु से बना हैं। इसमें 'ल्युट्' प्रत्यय का प्रयोग हैं। लुच हुआ धातु का अर्थ है 'देखना और आलोचना शब्द का अर्थ है सही प्रकार से किसी वस्तु को देखना। व्यापक स्तर पर आलोचना शब्द का अर्थ है किसी साहित्यिक रचना के गुण-दोषों का मूल्यांकन करना है। बाबू गुलाबराय के अनुसार, "आलोचना का मूल उद्देश्य कवि की कृति का सभी दृष्टिकोणों से आस्वाद कर पाठकों को उस प्रकार के आस्वाद में सहायता देना तथा उनकी रुचि को परिमार्जित करना एवं साहित्य की गति को निर्धारित करने में योगदान देना है।"

हिन्दी साहित्य के आदिकाल, भक्तिकाल तथा रीतिकाल में आलोचना का कोई व्यवस्थित रूप देखने को नहीं मिलता, केवल भक्तिकाल और रीतिकाल में आलोचनात्मक सूक्तियों का प्रचलन रहा। नाभादास ने अपनी रचना 'भक्तकाल' में हिन्दी के भक्त कवियों के सौन्दर्य पर प्रकार डाला हैं। इसी प्रकार रीतिकाल में रीति तथा अलंकार की दृष्टि में काव्य रचनाओं का मूल्यांकन किया गया, परन्तु आलोचना की दृष्टि से कुछ नहीं लिखा गया। अतः आधुनिक युग में ही आलोचना के मौलिक स्वरूप का आविर्गाव हुआ। इसका आरम्भ भारतेन्दु और उनके मंडल के साहित्यकारों ने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से किया। डॉ हुकुमचंद राजपाल ने आलोचना के उद्भव विकास क्रम को चार वर्गों में विभक्त किया है। ये हैं-

(1) भारतेन्दु कालीन अथवा आरम्भिक युगीन आलोचना - भारतेन्दु काल में हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं का श्रीगणेश हुआ। इस युग में गद्य साहित्य खड़ी बोली में ही लिखा गया था। साथ ही पत्र- पत्रिकाओं को प्रकाशन के साथ समालोचना साहित्य का भी निर्माण होने लगा। भारतेन्दु द्वारा रचित 'नाटक' नामक ग्रंथ आलोचना का महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जा सकता है। 'कवि वचन सुधा', 'हिन्दी प्रदीप', 'ब्राह्मण', हरिश्चन्द्र चन्द्रिका', आनंद कादम्बिनी' भारत मित्र' आदि पत्रिकाएँ इस युग की महान् उपलब्धि हैं। इनमें साहित्यिक रचनाओं पर परिचयात्मक टिप्पणियाँ छपती रहती थी। भारतेन्दु युग में बद्रीनाथ नारायण चौधरी 'प्रेमधन', 'कृष्ण भट्ट तथा प्रताप नारायण मिश्र के निबंधों में आलोचना पूर्ण रूप से दिखाई देती है। 'कवि वचन सुधा' नामक पत्रिका में हिन्दी कविता नाम से प्रथम आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित हुआ था। बद्रीनारायण चौधरी ने 'बंग विजेता' पर आलोचना लिखी तथा बाल कृष्ण भट्ट ने 'संयोगिता स्वयंवर' पर। सैद्धान्तिक समीक्षा का आरंभ भी इसी युग में हुआ। इस संदर्भ में भारतेन्दु द्वारा रचित 'नाटक' 'समालोचना आदर्श, जगन्नाथ रत्नाकर रचित 'समालोचना' समीक्षा' गंगा प्रसाद अग्निहोत्री रचित 'गद्य काव्य मीमांसा आदि सभी लेख आलोचनात्मक हैं।

(2) द्विवेदी कालीन अथवा विकाश युगीन आलोचना : द्विवेदी काल को सुधार काल के नाम से भी जाना जाता है। अतः इस युग में आलोचना के क्षेत्र में भी काफी सुधार हुआ। भारतेन्दु काल में सैद्धान्तिक और व्यवहारिक दो प्रकार की आलोचना पद्धतियों का विकाश हुआ था। द्विवेदी युग में इन दोनों के समन्वय पर बल दिया गया। डॉ. रामचन्द्र तिवारी ने द्विवेदी युगीन आलोचना को पांच वर्गों में विभक्त किया है

(i) शास्त्रीय आलोचना अर्थात् लक्षण ग्रथों की परंपरा में काव्यांग विवेचन
(ii) तुलनात्मक मूल्यांकन एवं निर्णय
(iii) अन्वेषण एवं अनुसंधानपरक आलोचना
(iv) परिचयात्मक आलोचना
(v) व्याख्यात्मक आलोचना

(3) शुक्लयुगीन अथवा उत्कर्षकालीन आलोचना - हिन्दी आलोचना के विकास क्रम में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का विशेष महत्व है। इनसे पहले हिन्दी में समीक्षा का कोई निश्चित मानक आधार नहीं था। केवल संस्कृत काव्यशास्त्र में माप दंड के आधार पर आलोचना की जा रही थी। शुक्ल जी ने अनुभव किया कि उपन्यास, नाटक, कहानी आदि विधाओं पर संस्कृत काव्यशास्त्र के माप दंड कारगर नहीं हो सकते। अतः उन्होंने हिन्दी आलोचना को साहित्यिक रूप दिया। इस युग में दो प्रकार की समीक्षा समाने आई। आचार्य शुक्ल की समीक्षा तथा छायावादी समीक्षकों की आलोचना। इस युग के समन्यवादी आलोचकों में गुलाबराय (नवरस), श्यामसुंदर दास (साहित्यालोचन), रामचन्द्र शुक्ल ( काव्य में रहस्यवाद ), लक्ष्मीनारायण सुधांशु (काव्य में अभिव्यंजनावाद), रमाशंकर शुक्लरसाल (आलोचना आदर्श) तथा राजकुमार वर्मा (साहित्य समालोचना) आदि के नाम गिनवाए जा सकते हैं। विशेषकर, आचार्य शुक्ल ने सैद्धान्तिक आलोचना के क्षेत्र में योगदान दिया। 'काव्य में रहस्यवाद', 'काव्य में अभिव्यंजनावाद', 'रस मीमांसा', 'साधारणीकरण' तथा ' व्यक्तिवैचित्र्यवाद', 'काव्य में प्रकृति दृश्य', 'रसात्मक बोध के विविध रूप', 'काव्य में रूप- मंगल की साधना अवस्था', 'कविता क्या है' आदि शुक्ल जी के काव्यशास्त्रीय आलोचनात्मक निबंध हैं। इसी प्रकार से शुक्ल जी ने 'गोस्वामी तुलसीदास', 'जायसी ग्रंथावली', 'सूरदास की भूमिका' आदि विषयों पर प्रयोगात्मक समीक्षाएँ लिखीं।

(4) शुक्लोत्तरकालीन अथवा समकालीन आलोचना - शुक्लोत्तर युग में सर्वप्रथम आचार्य नंद दुलारे बाजपेयी ने आचार्य शुक्ल की त्रुटियों का उल्लेख करते हुए आलोचना की नवीन पद्धतियों का उल्लेख किया। दूसरी ओर डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी तथा डॉ. नगेन्द्र ने शुक्ल जी को एक श्रेष्ठ आलोचक स्वीकार करते हुए हिन्दी आलोचना को आगे बढ़ाया। इस वादी युग के तीन महत्तवपूर्ण आलोचक हैं हजारी प्रसाद द्विवेदी, नगेन्द्र तथा रामविलास शर्मा। शुक्लोत्तर युग की आलोचना का आरंभ सौष्ठव समीक्षा से हुआ। विशेषकर छायावादी कवियों और उनके समर्थ आलोचकों ने सौंदर्यवादी समीक्षा को अपनाने पर बल दिया। इस संदर्भ में नंद दुलारे बाजपेयी ने कवि की संवेदना और उसकी अभिव्यक्ति के समन्वित अभिवेचन को स्वीकार किया। 'आधुनिक साहित्य', 'नया साहित्य', 'नए प्रश्न' 'कवि निराला', 'प्रकीर्णिका' तथा 'राष्ट्रीय साहित्य इनकी उल्लेखनीय आलोचनात्मक रचनाएँ हैं।

डॉ. नगेन्द्र एक रसवादी आलोचक हैं। इन्होंने व्यावहारिक और सैद्धान्तिक 'रस सिद्धान्त' आलोचनाओं पर बल दिया। मूल्यतः इनको छायावादी आलोचक के रूप में यश मिला। 'सुमित्रानंदन पंत', 'साकेत एक अध्ययन', 'रीतिकाव्य की भूमिका' तथा 'देव और उनकी कविता' अदि इनकी सौंदर्यात्मक चेतना के परिणाम हैं। इसी प्रकार 'आधुनिक हिन्दी नाटक', 'विचार और अनुभूति', 'आधुनिक हिन्दी कविता की मुख्य प्रवृत्तियाँ' तथा 'काव्य की संरचना' में डॉ. नगेन्द्र की मनोवैज्ञानिक दृष्टि देखी जा सकती है। डॉ नगेन्द्र का नाम समकालीन समीक्षकों में भी गिनवाया जा सकता है। शुक्लोत्तर युग की आलोचना पद्धति को छह वर्गों में विभक्त किया गया है.

(i) ऐतिहासिक समीक्षा - इस समीक्षा पद्धति से हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामप्रसाद वर्मा तथा भागीरथ मिश्र के नाम जुड़े हुए हैं। इस पद्धति के अंतर्गत समाज के परिवर्तित बाह्य और आंतरिक परिवेश में साहित्य का अंकन किया जाता है। विशेषकर परशुराम चतुर्वेदी की रचना 'उतरी भारत की संत पंरपरा ' इसी श्रेणी की रचना है। डॉ. राजकुमार वर्मा ने अपनी रचना 'हिन्दी आलोचनात्मक इतिहास' में अनेक कवियों का मूल्यांकन इसी पद्धति के आधार पर किया है!

(ii) सैद्धांतिक समीक्षा - बाबू गुलाब राय, डॉ नगेन्द्र, बलदेव उपाध्याय, राममूर्ति त्रिपाठी आदि कुछ सैद्धान्तिक समीक्षक है। उदाहरण के रूप में, बाबू गुलाब राय ने 'काव्य के रूप सिद्धान्त और अध्ययन' तथा 'हिन्दी नाटक विमश में भारतीय और पाश्चात्य काव्यशास्त्र का विवेचना किया है। इसी प्रकार 'रीतिकाव्य की भूमिका', 'भारतीय काव्यशास्त्र की भूमिका', 'रस सिद्धान्त', काव्य बिम्ब', 'आस्था के चरण' आदि। डॉ. नगेन्द्र के सैद्धान्तिक समीक्षा के ग्रंथ हैं।

(iii) व्यावहारिक समीक्षा - रचना की मूल संवेदना को आधार बनाकर निर्धारित मापदण्डों के अनुसार उसका मूल्यांकन करना ही व्यावहारिक समीक्षा कहलाता है। आचार्य नंद दुलारे बाजपेयी व्यावहारिक समीक्षा के जनक कहे जा सकते हैं। उन्होंने न केवल प्रेमचन्द की त्रुटियों की ओर संकेत किया, बल्कि नई कविता को एक नवीन दिशा भी प्रदान की।

(iv) मनोविश्लेषणात्मक समीक्षा - मन पर पड़े हुए प्रभावों के सन्दर्भ में किसी रचना की समीक्षा करना मनोविश्लेषणात्मक समीक्षा कहलाता है। इस समीक्षा पद्धति में फ्रायड, एडलर तथा युग के सिद्धान्तों के आधार पर रचना विशेष का मूल्यांकन किया जाता है। इस परम्परा के सर्वश्रेष्ठ समीक्षक हैं। डॉ. देवराज उपाध्याय। इनके अतिरिक्त इलाचन्द्र जोशी तथा अज्ञेय के नाम भी गिनवाए जा सकते हैं।

(v) मार्क्सवादी (प्रगतिवादी) समीक्षा - मार्क्स के सिद्धान्तों का आधार बनाकर रचना विशेष का मूल्यांकन करना मार्क्सवादी समीक्षा कहलाता है। शिवदान सिंह चौहान, राम विलास शर्मा, नामवर सिंह, शिव कुमार मिश्र, रांगेय राघव, प्रकाश चन्द्रगुप्त आदि कुछ प्रमुख मार्क्सवादी समीक्षक हैं। इनमें डॉ. राम विलास शर्मा का नाम सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। प्रगति और परम्परा' का मूल्यांकन' आदि शर्मा जी के प्रसिद्ध निबंध संग्रह हैं।

(vi) वैज्ञानिक समीक्षा - इस समीक्षा में विभिन्न विश्वविद्यालयों में पी.एच.डी. तथा डी. लिट् की उपाधियों के लिए प्रस्तुत किए गए शोध प्रबन्धों की गणना की जाती है। इसमें शोध तथा आलोचना दोनो का समन्वित रूप देखा जा सकता है। उदाहरण के रूप में डॉ माता प्रसाद गुप्त ने 'तुलसीदास' ग्रंथ में इसी प्रद्धति का सहारा लेते हुए प्रौढ़ विवेचन प्रस्तुत किया है। यही नहीं, उन्होंने पाठालोचन पद्धति द्वारा 'बीसलदेव रासो', 'पद्मावत', 'चंदायन', 'मृगावती' आदि रचनाओं का पाठ शोधन किया। आज वैज्ञानिक समीक्षा को आधार बनाकर असंख्य लोग पी. एच. डी. तथा डी. लिट की उपाधियाँ प्राप्त कर रहे हैं।

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    अनुक्रम

  1. प्रश्न- काव्य के प्रयोजन पर प्रकाश डालिए।
  2. प्रश्न- भारतीय आचार्यों के मतानुसार काव्य के प्रयोजन का प्रतिपादन कीजिए।
  3. प्रश्न- हिन्दी आचायों के मतानुसार काव्य प्रयोजन किसे कहते हैं?
  4. प्रश्न- पाश्चात्य मत के अनुसार काव्य प्रयोजनों पर विचार कीजिए।
  5. प्रश्न- हिन्दी आचायों के काव्य-प्रयोजन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए?
  6. प्रश्न- आचार्य मम्मट के आधार पर काव्य प्रयोजनों का नाम लिखिए और किसी एक काव्य प्रयोजन की व्याख्या कीजिए।
  7. प्रश्न- भारतीय आचार्यों द्वारा निर्दिष्ट काव्य लक्षणों का विश्लेषण कीजिए
  8. प्रश्न- हिन्दी के कवियों एवं आचार्यों द्वारा प्रस्तुत काव्य-लक्षणों में मौलिकता का अभाव है। इस मत के सन्दर्भ में हिन्दी काव्य लक्षणों का निरीक्षण कीजिए 1
  9. प्रश्न- पाश्चात्य विद्वानों द्वारा बताये गये काव्य-लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
  10. प्रश्न- आचार्य मम्मट द्वारा प्रदत्त काव्य-लक्षण की विवेचना कीजिए।
  11. प्रश्न- रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्' काव्य की यह परिभाषा किस आचार्य की है? इसके आधार पर काव्य के स्वरूप का विवेचन कीजिए।
  12. प्रश्न- महाकाव्य क्या है? इसके सर्वमान्य लक्षण लिखिए।
  13. प्रश्न- काव्य गुणों की चर्चा करते हुए माधुर्य गुण के लक्षण स्पष्ट कीजिए।
  14. प्रश्न- मम्मट के काव्य लक्षण को स्पष्ट करते हुए उठायी गयी आपत्तियों को लिखिए।
  15. प्रश्न- 'उदात्त' को परिभाषित कीजिए।
  16. प्रश्न- काव्य हेतु पर भारतीय विचारकों के मतों की समीक्षा कीजिए।
  17. प्रश्न- काव्य के प्रकारों का विस्तृत उल्लेख कीजिए।
  18. प्रश्न- स्थायी भाव पर एक टिप्पणी लिखिए।
  19. प्रश्न- रस के स्वरूप का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
  20. प्रश्न- काव्य हेतु के रूप में निर्दिष्ट 'अभ्यास' की व्याख्या कीजिए।
  21. प्रश्न- 'रस' का अर्थ स्पष्ट करते हुए उसके अवयवों (भेदों) का विवेचन कीजिए।
  22. प्रश्न- काव्य की आत्मा पर एक निबन्ध लिखिए।
  23. प्रश्न- भारतीय काव्यशास्त्र में आचार्य ने अलंकारों को काव्य सौन्दर्य का भूल कारण मानकर उन्हें ही काव्य का सर्वस्व घोषित किया है। इस सिद्धान्त को स्वीकार करने में आपकी क्या आपत्ति है? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
  24. प्रश्न- काव्यशास्त्रीय सम्प्रदायों के महत्व को उल्लिखित करते हुए किसी एक सम्प्रदाय का सम्यक् विश्लेषण कीजिए?
  25. प्रश्न- अलंकार किसे कहते हैं?
  26. प्रश्न- अलंकार और अलंकार्य में क्या अन्तर है?
  27. प्रश्न- अलंकारों का वर्गीकरण कीजिए।
  28. प्रश्न- 'तदोषौ शब्दार्थों सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि कथन किस आचार्य का है? इस मुक्ति के आधार पर काव्य में अलंकार की स्थिति स्पष्ट कीजिए।
  29. प्रश्न- 'काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते' कथन किस आचार्य का है? इसका सम्बन्ध किस काव्य-सम्प्रदाय से है?
  30. प्रश्न- हिन्दी में स्वीकृत दो पाश्चात्य अलंकारों का उदाहरण सहित परिचय दीजिए।
  31. प्रश्न- काव्यालंकार के रचनाकार कौन थे? इनकी अलंकार सिद्धान्त सम्बन्धी परिभाषा को व्याख्यायित कीजिए।
  32. प्रश्न- हिन्दी रीति काव्य परम्परा पर प्रकाश डालिए।
  33. प्रश्न- काव्य में रीति को सर्वाधिक महत्व देने वाले आचार्य कौन हैं? रीति के मुख्य भेद कौन से हैं?
  34. प्रश्न- रीति सिद्धान्त की अन्य भारतीय सम्प्रदायों से तुलना कीजिए।
  35. प्रश्न- रस सिद्धान्त के सूत्र की महाशंकुक द्वारा की गयी व्याख्या का विरोध किन तर्कों के आधार पर किया गया है? स्पष्ट कीजिए।
  36. प्रश्न- ध्वनि सिद्धान्त की भाषा एवं स्वरूप पर संक्षेप में विवेचना कीजिए।
  37. प्रश्न- वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ ध्वनि में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
  38. प्रश्न- 'अभिधा' किसे कहते हैं?
  39. प्रश्न- 'लक्षणा' किसे कहते हैं?
  40. प्रश्न- काव्य में व्यञ्जना शक्ति पर टिप्पणी कीजिए।
  41. प्रश्न- संलक्ष्यक्रम ध्वनि को सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
  42. प्रश्न- दी गई पंक्तियों में में प्रयुक्त ध्वनि का नाम लिखिए।
  43. प्रश्न- शब्द शक्ति क्या है? व्यंजना शक्ति का सोदाहरण परिचय दीजिए।
  44. प्रश्न- वक्रोकित एवं ध्वनि सिद्धान्त का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
  45. प्रश्न- कर रही लीलामय आनन्द, महाचिति सजग हुई सी व्यक्त।
  46. प्रश्न- वक्रोक्ति सिद्धान्त व इसकी अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
  47. प्रश्न- वक्रोक्ति एवं अभिव्यंजनावाद के आचार्यों का उल्लेख करते हुए उसके साम्य-वैषम्य का निरूपण कीजिए।
  48. प्रश्न- वर्ण विन्यास वक्रता किसे कहते हैं?
  49. प्रश्न- पद- पूर्वार्द्ध वक्रता किसे कहते हैं?
  50. प्रश्न- वाक्य वक्रता किसे कहते हैं?
  51. प्रश्न- प्रकरण अवस्था किसे कहते हैं?
  52. प्रश्न- प्रबन्ध वक्रता किसे कहते हैं?
  53. प्रश्न- आचार्य कुन्तक एवं क्रोचे के मतानुसार वक्रोक्ति एवं अभिव्यंजना के बीच वैषम्य का निरूपण कीजिए।
  54. प्रश्न- वक्रोक्तिवाद और वक्रोक्ति अलंकार के विषय में अपने विचार व्यक्त कीजिए।
  55. प्रश्न- औचित्य सिद्धान्त किसे कहते हैं? क्षेमेन्द्र के अनुसार औचित्य के प्रकारों का वर्गीकरण कीजिए।
  56. प्रश्न- रसौचित्य किसे कहते हैं? आनन्दवर्धन द्वारा निर्धारित विषयों का उल्लेख कीजिए।
  57. प्रश्न- गुणौचित्य तथा संघटनौचित्य किसे कहते हैं?
  58. प्रश्न- प्रबन्धौचित्य के लिये आनन्दवर्धन ने कौन-सा नियम निर्धारित किया है तथा रीति औचित्य का प्रयोग कब करना चाहिए?
  59. प्रश्न- औचित्य के प्रवर्तक का नाम और औचित्य के भेद बताइये।
  60. प्रश्न- संस्कृत काव्यशास्त्र में काव्य के प्रकार के निर्धारण का स्पष्टीकरण दीजिए।
  61. प्रश्न- काव्य के प्रकारों का विस्तृत उल्लेख कीजिए।
  62. प्रश्न- काव्य गुणों की चर्चा करते हुए माधुर्य गुण के लक्षण स्पष्ट कीजिए।
  63. प्रश्न- काव्यगुणों का उल्लेख करते हुए ओज गुण और प्रसाद गुण को उदाहरण सहित परिभाषित कीजिए।
  64. प्रश्न- काव्य हेतु के सन्दर्भ में भामह के मत का प्रतिपादन कीजिए।
  65. प्रश्न- ओजगुण का परिचय दीजिए।
  66. प्रश्न- काव्य हेतु सन्दर्भ में अभ्यास के महत्व पर प्रकाश डालिए।
  67. प्रश्न- काव्य गुणों का संक्षित रूप में विवेचन कीजिए।
  68. प्रश्न- शब्द शक्ति को स्पष्ट करते हुए अभिधा शक्ति पर प्रकाश डालिए।
  69. प्रश्न- लक्षणा शब्द शक्ति को समझाइये |
  70. प्रश्न- व्यंजना शब्द-शक्ति पर प्रकाश डालिए।
  71. प्रश्न- काव्य दोष का उल्लेख कीजिए।
  72. प्रश्न- नाट्यशास्त्र से क्या अभिप्राय है? भारतीय नाट्यशास्त्र का सामान्य परिचय दीजिए।
  73. प्रश्न- नाट्यशास्त्र में वृत्ति किसे कहते हैं? वृत्ति कितने प्रकार की होती है?
  74. प्रश्न- अभिनय किसे कहते हैं? अभिनय के प्रकार और स्वरूप पर प्रकाश डालिए।
  75. प्रश्न- रूपक किसे कहते हैं? रूप के भेदों-उपभेंदों पर प्रकाश डालिए।
  76. प्रश्न- कथा किसे कहते हैं? नाटक/रूपक में कथा की क्या भूमिका है?
  77. प्रश्न- नायक किसे कहते हैं? रूपक/नाटक में नायक के भेदों का वर्णन कीजिए।
  78. प्रश्न- नायिका किसे कहते हैं? नायिका के भेदों पर प्रकाश डालिए।
  79. प्रश्न- हिन्दी रंगमंच के प्रकार शिल्प और रंग- सम्प्रेषण का परिचय देते हुए इनका संक्षिप्त विवेचन कीजिए।
  80. प्रश्न- नाट्य वृत्ति और रस का सम्बन्ध बताइए।
  81. प्रश्न- वर्तमान में अभिनय का स्वरूप कैसा है?
  82. प्रश्न- कथावस्तु किसे कहते हैं?
  83. प्रश्न- रंगमंच के शिल्प का संक्षिप्त विवेचन कीजिए।
  84. प्रश्न- अरस्तू के 'अनुकरण सिद्धान्त' को प्रतिपादित कीजिए।
  85. प्रश्न- अरस्तू के काव्यं सिद्धान्त का विवेचन कीजिए।
  86. प्रश्न- त्रासदी सिद्धान्त पर प्रकाश डालिए।
  87. प्रश्न- चरित्र-चित्रण किसे कहते हैं? उसके आधारभूत सिद्धान्त बताइए।
  88. प्रश्न- सरल या जटिल कथानक किसे कहते हैं?
  89. प्रश्न- अरस्तू के अनुसार महाकाव्य की क्या विशेषताएँ हैं?
  90. प्रश्न- "विरेचन सिद्धान्त' से क्या तात्पर्य है? अरस्तु के 'विरेचन' सिद्धान्त और अभिनव गुप्त के 'अभिव्यंजना सिद्धान्त' के साम्य को स्पष्ट कीजिए।
  91. प्रश्न- कॉलरिज के काव्य-सिद्धान्त पर विचार व्यक्त कीजिए।
  92. प्रश्न- मुख्य कल्पना किसे कहते हैं?
  93. प्रश्न- मुख्य कल्पना और गौण कल्पना में क्या भेद है?
  94. प्रश्न- वर्ड्सवर्थ के काव्य-भाषा विषयक सिद्धान्त पर प्रकाश डालिये।
  95. प्रश्न- 'कविता सभी प्रकार के ज्ञानों में प्रथम और अन्तिम ज्ञान है। पाश्चात्य कवि वर्ड्सवर्थ के इस कथन की विवेचना कीजिए।
  96. प्रश्न- वर्ड्सवर्थ के कल्पना सम्बन्धी विचारों का संक्षेप में विवेचन कीजिए।
  97. प्रश्न- वर्ड्सवर्थ के अनुसार काव्य प्रयोजन क्या है?
  98. प्रश्न- वर्ड्सवर्थ के अनुसार कविता में छन्द का क्या योगदान है?
  99. प्रश्न- काव्यशास्त्र की आवश्यकता का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
  100. प्रश्न- रिचर्ड्स का मूल्य-सिद्धान्त क्या है? स्पष्ट रूप से विवेचन कीजिए।
  101. प्रश्न- रिचर्ड्स के संप्रेषण के सिद्धान्त पर प्रकाश डालिए।
  102. प्रश्न- रिचर्ड्स के अनुसार सम्प्रेषण का क्या अर्थ है?
  103. प्रश्न- रिचर्ड्स के अनुसार कविता के लिए लय और छन्द का क्या महत्व है?
  104. प्रश्न- 'संवेगों का संतुलन' के सम्बन्ध में आई. ए. रिचर्डस् के क्या विचारा हैं?
  105. प्रश्न- आई.ए. रिचर्ड्स की व्यावहारिक आलोचना की समीक्षा कीजिये।
  106. प्रश्न- टी. एस. इलियट के प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। इसका हिन्दी साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा है?
  107. प्रश्न- सौन्दर्य वस्तु में है या दृष्टि में है। पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र के अनुसार व्याख्या कीजिए।
  108. प्रश्न- हिन्दी आलोचना के उद्भव तथा विकासक्रम पर एक निबन्ध लिखिए।
  109. प्रश्न- स्वच्छंदतावाद से क्या तात्पर्य है? उसका उदय किन परिस्थितियों में हुआ?
  110. प्रश्न- साहित्य में मार्क्सवादी समीक्षा का क्या अभिप्राय है? विवेचना कीजिए।
  111. प्रश्न- आधुनिक साहित्य में मनोविश्लेषणवाद के योगदान की विवेचना कीजिए।
  112. प्रश्न- आलोचना की पारिभाषा एवं उसके स्वरूप पर प्रकाश डालिए।
  113. प्रश्न- हिन्दी की मार्क्सवादी आलोचना पर प्रकाश डालिए।
  114. प्रश्न- हिन्दी आलोचना पद्धतियों को बताइए। आलोचना के प्रकारों का भी वर्णन कीजिए।
  115. प्रश्न- स्वच्छंदतावाद के अर्थ और स्वरूप पर प्रकाश डालिए।
  116. प्रश्न- मनोविश्लेषवाद की समीक्षा दीजिए।
  117. प्रश्न- मार्क्सवाद की दृष्टिकोण मानवतावादी है इस कथन के आलोक में मार्क्सवाद पर विचार कीजिए?
  118. प्रश्न- नयी समीक्षा पद्धति पर लेख लिखिए।
  119. प्रश्न- विखंडनवाद को समझाइये |
  120. प्रश्न- यथार्थवाद का अर्थ और परिभाषा देते हुए यथार्थवाद के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
  121. प्रश्न- कलावाद किसे कहते हैं? कलावाद के उद्भव और विकास पर प्रकाश डालिए।
  122. प्रश्न- बिम्बवाद की अवधारणा, विचार और उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
  123. प्रश्न- प्रतीकवाद के अर्थ और परिभाषा का वर्णन कीजिए।
  124. प्रश्न- संरचनावाद में आलोचना की किस प्रविधि का विवेचन है?
  125. प्रश्न- विखंडनवादी आलोचना का आशय स्पष्ट कीजिए।
  126. प्रश्न- उत्तर-संरचनावाद के उद्भव और विकास को स्पष्ट कीजिए।
  127. प्रश्न- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की काव्य में लोकमंगल की अवधारणा पर प्रकाश डालिए।
  128. प्रश्न- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना दृष्टि "आधुनिक साहित्य नयी मान्यताएँ" का उल्लेख कीजिए।
  129. प्रश्न- "मेरी साहित्यिक मान्यताएँ" विषय पर डॉ0 नगेन्द्र की आलोचना दृष्टि पर विचार कीजिए।
  130. प्रश्न- डॉ0 रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि 'तुलसी साहित्य में सामन्त विरोधी मूल्य' का मूल्यांकन कीजिए।
  131. प्रश्न- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की आलोचनात्मक दृष्टि पर प्रकाश डालिए।
  132. प्रश्न- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी की साहित्य की नई मान्यताएँ क्या हैं?
  133. प्रश्न- रामविलास शर्मा के अनुसार सामंती व्यवस्था में वर्ण और जाति बन्धन कैसे थे?

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