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बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
प्रश्न- कम्प्यूटर की सामान्य रचना, कार्य-प्रणाली और उनके शिक्षण में शैक्षिक उपयोग का वर्णन कीजिए।
अथवा
"कम्प्यूटर कक्षा शिक्षण तथा स्वयं शिक्षण में काफी प्रभावपूर्ण सिद्ध हो सकता है।" इस कथन के विषय में कम्प्यूटर शिक्षण का उपयोग बताइए।
अथवा
कम्प्यूटर क्या है? वाणिज्य शिक्षण में इसकी क्या उपयोगिता है?
उत्तर-
शिक्षा के क्षेत्र में कम्प्यूटरों का प्रयोग नवीनतम शैक्षिक तकनीक का प्रतिनिधित्व करता है। यह उपकरण अनुदेशन प्रक्रिया को अधिक से अधिक वैयक्तिक स्वचालित बनाता है। सभी प्रकार के छोटे-बड़े कम्प्यूटर अपने आप में एक मशीन हैं। मशीन की तरह यह कम समय में कम शक्ति लगाकर अकल्पनीय सामर्थ्य वाले कार्य कर सकते हैं। अपने कार्य में संपादन हेतु मृदु उपागम का प्रयोग किया जाता है। कम्प्यूटर वही करता है जिसे करने के लिए कम्प्यूटर कार्यक्रम के रूप में भरे जाने वाले मृदु उपागम से उसे दिशा निर्देश मिलते हैं। इस दृष्टि से इसे पूर्ण आत्मनिर्भर स्वयं सोचने और विचार करने में समर्थ मशीन नहीं बल्कि एक कम्प्यूटर कार्यक्रम तैयार करने वाले विचारशील व्यक्ति की विचार मशीन का नाम दिया जाना अधिक उपयुक्त है। कम्प्यूटर लेखक का कार्य हर प्रकार से काफी जटिल और तकनीक युक्त होता है और इसे करने के लिए विषय-वस्तु और अनुदेशन तकनीकी पर पूर्ण अधिकार होने के अतिरिक्त कम्प्यूटर द्वारा समझी जाने वाली भाषा और विशेष निर्देशन कोड के ज्ञान की आवश्यकता होती है। इसके द्वारा वाणिज्य संबंधी विभिन्न तथ्यों जैसे विभिन्न उद्योग कहाँ स्थित हैं ? खनिज पदार्थ कहाँ उपलब्ध हैं आदि की जानकारी उपलब्ध हो जाती है।
शिक्षण-सामग्री के रूप में कम्प्यूटर के कार्य
(i) अभ्यास कार्य करना - किसी भी पूर्व अर्जित ज्ञान एवं कौशल का अभ्यास करने के लिए कम्प्यूटर का प्रयोग किया जा सकता है।
बालक को किसी प्रश्न का उत्तर- कुंजीपटल पर स्थित संख्या संबंधी कुंजियों में से कुछ दबाकर टाइप सामग्री के रूप में देना होता है। यदि उत्तर- गलत है तो कम्प्यूटर पर्दे पर 'गलत' (Wrong) शब्द का प्रदर्शन करता है और यदि सही है तो बालक के सामने अभ्यास के लिए नई समस्या प्रस्तुत कर दी जाती है। कम्प्यूटर को जो भी अनुक्रिया करनी होती है वह सेकेन्ड से भी कई गुणा सूक्ष्म अंशों में तत्काल ही होती है। इसलिए बालक को अपनी क्रिया के पुनर्बलन या प्रत्युत्तर (Response) पाने के लिए प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।
(ii) पूछताछ में सहायता देना - कम्प्यूटर से जो कुछ भी पूछा जाता है उसका तुरन्त उत्तर- देने में पूरी तरह से समर्थ होता है। इस प्रकार से एक बालक अपनी जिज्ञासा और प्रश्नों को जो भी उत्तर- * या समाधान प्राप्त करना चाहता है वह उसे कम्प्यूटर द्वारा तुरन्त ही मिल जाते हैं।
(iii) ट्यूटोरियल सेवाएँ प्रदान करना - व्यक्तिगत रूप से हर बालक के साथ उचित अन्तःक्रिया का कम्प्यूटर एक अच्छे ट्यूटर की भूमिका भली-भाँति निभाता है। इस भूमिका के निर्वाह के लिए जो कम्प्यूटर कार्यक्रम तैयार किए जाते हैं उनके द्वारा एक ओर तो विषय विशेष से सम्बन्धित प्रकरणों और दूसरी ओर विद्यार्थियों की व्यक्तिगत कठिनाइयों, योग्यता और लब्धि स्तर को ध्यान में रखते हुए अपेक्षित अभ्यास कार्य का आयोजन किया जाता है ताकि उन्हें अपनी योग्यता, रुचि, आवश्यकताओं एवं गति से अधिगम मार्ग पर आगे बढने का अवसर मिल सके!
(iv) अनुरूपन और क्रीडन तकनीक के उपयोग में सहायक - कम्प्यूटर सम्बन्धी कार्यक्रम छात्रों को विभिन्न प्रकार के शिक्षण प्रदान करने हेतु अच्छी प्रकार से काम में लाए जा सकते हैं। जिस कार्य का प्रशिक्षण वास्तविक रूप में प्राप्त करना कठिन होता है वह कम्प्यूटर कार्यक्रमों द्वारा व्यवस्थित परिस्थितियों में अच्छी प्रकार से सम्पन्न हो सकता है।
(v) समस्या समाधान योग्यता और सृजनात्मकता का विकास करना - कम्प्यूटर कार्यक्रमों को छात्रों में समस्या समाधान योग्यता तथा सृजनात्मकता का विकास करने हेतु भी भली-भाँति काम में लाया जा सकता है। अपने अनुरूपित कार्यक्रमों के अतिरिक्त ऐसे अनेक कार्यक्रम कम्प्यूटरों पर प्रदर्शित किए जा सकते हैं जिनके माध्यम से बालकों को समस्याओं की अच्छी प्रकार से जाँच कर अपनी मौलिकता, विविध चिन्तन, तर्क एवं विचारपूर्ण चिन्तन का प्रयोग करते हुए एक ओर तो सृजनात्मक योग्यता को विकसित करने का अवसर मिलता है तो दूसरी ओर स्वतन्त्र रूप से समस्याओं का समाधान करने की योग्यता भी विकसित होती है।
(vi) प्रयोगशाला कार्य तथा अन्य प्रयोगिक कार्यों को सम्पन्न करने में सहायक - कम्प्यूटर कार्यक्रम विद्यार्थियों को अपने विषय से सम्बन्धित प्रायोगिक कार्यों से सम्बन्धित कम्प्यूटर कार्यक्रम चाहे वे किसी भी विषय से सम्बन्धित हों अच्छी तरह उपलब्ध हो जाते हैं। अतः एक छात्र अपनी इच्छानुसार प्रयोग कार्यों को कम्प्यूटर के पर्दे पर देख सकता है और इस प्रकार कक्षा में जाने से पूर्व तैयारी करने, प्रयोग कार्य के कौशल का भली-भाँति निरीक्षण करने, उसका अभ्यास करने तथा आवश्यक शंकाओं के निवारण का कार्य कम्प्यूटरों द्वारा अच्छी प्रकार से निभाया जा सकता है।
(vii) अधिगम सम्बन्धी अन्य कार्यों का प्रबन्ध - क्रियाओं की निगरानी और जाँच पड़ताल का कार्य कम्प्यूटर अच्छी प्रकार से निभा सकते हैं। इनके द्वारा निदानात्मकता परीक्षाओं के माध्यम से छात्रों की कमजोरियों का पता चल सकता है और फिर उनकी आवश्यकताओं के अनुकूल उन्हें उचित अनुदेशन दिया जा सकता है। कम्प्यूटरों से छात्रों के प्रदत्त कार्य देने, कक्षा में अभ्यास करने, स्वअध्ययन, पुस्तकालय अध्ययन तथा समूह कार्य आदि में सहायता करने, मूल्यांकन करने, प्रगति चार्ट बनाने और अध्यापक तथा अभिभावकों को अपने बालकों की शिक्षा में नियोजित करने में उचित परामर्श देने आदि विभिन्न कार्यों को पूरा करने में पूरी-पूरी सहायता मिल सकती है।
सीमाएँ-
अपने बहुआयामी उपयोगों तथा विशेषताओं के होते हुए भी कम्प्यूटर के शिक्षण साधन के रूप में प्रयुक्त करने के कार्य में प्रायः निम्न प्रकार की बाधाओं एवं कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है-
(i) खर्चीला - कक्षा शिक्षण में कम्प्यूटरों का उपयोग होने वाले शैक्षिक लाभों की तुलना काफी खर्चीला सिद्ध होता है।
(ii) मरम्मत की समस्या - कम्प्यूटर मशीनों की मरम्मत तथा देखभाल भी अपने आप में एक समस्या खड़ी कर देती है।
(iii) लापरवाही तथा समय बर्बाद - कम्प्यूटर कार्य में सम्पन्न अनुदेशन कार्य में अधिगमकर्त्ता स्वयं ही अनुदेशन कार्य का पूर्ण नियन्त्रण करने वाला तथा स्वामी होता है। वह अपनी इच्छानुसार कम्प्यूटर को प्रयोग में लाकर जिस प्रकार भी तथा जितनी देर भी अध्ययन करना चाहे, करने के लिए स्वतन्त्र होता है। परिणामस्वरूप ऐसी दशाओं में व्यर्थ समय बर्बाद करने, लापरवाही बरतने तथा मनमर्जी का आचरण करने की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं।
(iv) मृदु उपागमों की समस्या - कम्प्यूटरों के उपयोग में मुख्य परेशानी इनमें प्रयुक्त मृदु उपागमों के सम्बन्ध में है।
ये परेशानियाँ कुछ इस प्रकार हैं-
(क) बहुत बार किसी विषय विशेष तथा प्रकरण के अनुदेशन हेतु कोई कम्प्यूटर कार्यक्रम उपलब्ध ही नहीं हो पाता।
(ख) कई बार अच्छे लेबल लगाकर कम्प्यूटर कम्पनियों द्वारा ऐसे कार्यक्रमों को भेज दिया जाता है जो वास्तव में अनुदेशन या शैक्षिक दृष्टि से बिल्कुल ही अनुपयोगी अथवा त्रुटिपूर्ण होते हैं।
(v) यान्त्रिक ढंग बहुत ही ऊबाऊ - कम्प्यूटर प्रयुक्त अनुदेशन कार्य में विद्यार्थियों को अपनी अनुक्रियाओं को व्यक्त करने के लिए या तो Key board से टाइप करना होता है अथवा T. V. Screen के सामने प्रकाश संकेतों का प्रयोग करना होता है। अनुदेशन का अन्तराल लम्बा होने पर छात्रों द्वारा अनुक्रियाओं के लिए अपनाए गए ये यान्त्रिक ढंग बहुत ही थकाने वाले तथा ऊबाऊ होते हैं। फिर भी छात्रों को यह सब झेलना होता है।
(vi) विद्युत उपकरण से खतरा - विद्युत उपकरण के रूप में कम्प्यूटर बालकों के लिए काफी खतरनाक भी सिद्ध हो सकते हैं। कई बार बालकों को जहाँ विद्युत आघात लगने की सम्भावना रहती है वहाँ उनके द्वारा इन यन्त्रों के शीघ्र ही खराब होने का भी डर रहता है।
(vii) समायोजन होने की समस्या - कम्प्यूटर चाहे कितने भी अच्छे और प्रभावशाली क्यों न बन जायें, उनका वर्तमान परिस्थितियों में ठीक प्रकार से स्कूल और कॉलेज की औपचारिक अनुदेशन व्यवस्था में समायोजित होना काफी कठिन कार्य है। न तो हम इस व्यवस्था के स्थान पर कोई बिलकुल नयी व्यवस्था ला सकते हैं और न परम्परागत अनुदेशन के स्थान पर पूरी तरह कम्प्यूटर निर्देशित अनुदेशन को लागू कर अराजकता और अव्यवस्था को नियन्त्रण प्रदान करने का साहस ही कर सकते हैं।
(viii) कम्प्यूटर केवल निर्जीव यन्त्र है - कम्प्यूटर द्वारा सम्पन्न अनुदेशन व्यवस्था में एक अन्य कमी यह है कि प्रत्येक कम्प्यूटर चाहे वह कितना विकसित क्यों न हो, मूल रूप से एक मशीन ही है तथा कोई भी मशीन या यांत्रिक प्रणाली मानव के साथ अन्तःक्रिया करने में मानव के साथ मुकाबला नहीं कर सकती। जो संवेग, प्रेम तथा सहानुभूति और हृदयों का पारस्परिक सामीप्य छात्र - अध्यापकों की सजीव अन्तः क्रिया और सम्बन्धों में पाया जाता है वह निर्जीव कम्प्यूटरों द्वारा प्राप्त नहीं हो सकता। अतः शिक्षा का कम्प्यूटरीकरण कभी भी शिक्षक का स्थान नहीं ले सकता।
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