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बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 वाणिज्य शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
प्रश्न- पाठ्यक्रम निर्माण के मुख्य सिद्धान्त कौन-कौन से हैं? विस्तार से वर्णन कीजिए।
अथवा
पाठ्यक्रम विकास के सिद्धांतों की विस्तृत व्याख्या कीजिए।
अथवा
पाठ्यक्रम निर्माण के सिद्धान्तों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
पाठ्यक्रम ही वह केन्द्र बिन्दु है, जिसके चारों ओर शिक्षात्मक प्रयास संगठित किया जाता है और इसमें बच्चे की वे समस्त क्रियाएँ सम्मिलित हैं, जिन्हें अध्यापकों के मार्गदर्शन में व्यवस्थित किया जाता है। पाठ्यक्रम रचना बिना सोचे-समझे की जाने वाली क्रिया नहीं, बल्कि यह एक सुनियोजित क्रिया है और इसे इस प्रकार संपन्न किया जाना चाहिए कि यह विद्यालय के उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक सिद्ध हो। पहले से विद्यमान पाठ्यक्रम में सम्मिलित की जाने वाली कोई भी नवीन क्रिया, शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति की दिशा में एक पग के रूप में सिद्ध होनी चाहिए, प्रभावशाली पाठ्यक्रम रचना के लिए निम्नलिखित सिद्धान्तों की सहायता ली जा सकती है-
(1) जीवन से सम्बन्धित होने का सिद्धान्त
(2) लचीलेपन का सिद्धान्त
(3) उपयोगिता का सिद्धान्त
(4) तत्परता का सिद्धान्त
(5) व्यापकता का सिद्धान्त
(6) सह संबंध या समवाय का सिद्धान्त
(7) सामुदायिक जीवन से सम्बन्ध का सिद्धान्त
(8) विषयों के पारस्परिक सम्बन्ध का सिद्धान्त
(9) अवकाश के प्रशिक्षण का सिद्धान्त
10) विकास की सतत् प्रक्रिया का सिद्धान्त
(11) राष्ट्रीय लक्ष्यों एवं लोकतंत्रात्मक गुणों के विकास का सिद्धान्त
(12) परिपक्वता का सिद्धान्त
(1) जीवन से संबंधित होने का सिद्धान्त - पाठ्यक्रम में ऐसे विषयों और क्रियाओं को स्थान दिया जाना चाहिए, जिनका वास्तविक जीवन से संबंध हो। इनके द्वारा छात्रों में उन योग्यताओं और क्षमताओं का विकास हो सकेगा जो उन्हें भावी सामाजिक जीवन को सफलतापूर्वक व्यतीत करने में सहायक सिद्ध होंगे, साथ ही वह समाज में अपना समुचित स्थान बना सकेगा।
(2) लचीलेपन का सिद्धान्त - पाठ्यक्रम को बालकों की रुचियों, विभिन्नताओं, प्रवृत्तियों, दृष्टिकोणों तथा आवश्यकताओं के अनुकूल बनाने के लिए यह आवश्यक है कि यह लचीला तथा विविधता से पूर्ण हो। हमें उन पर अनुपयुक्त विषयों का बोझ नहीं लादना चाहिए। यदि ऐसा किया जाता है, तो इससे उनके सामान्य विकास में बाधा पड़ती है। अतः पाठ्यक्रम में ज्ञान, कुशलता और मूल्यांकन के लिए विस्तृत क्षेत्रों का समावेश किया जाना चाहिए, जो बालक की व्यक्तिगत भिन्नता के दृष्टिकोण उनके विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएँ।
(3) उपयोगिता का सिद्धान्त - विषयों एवं क्रियाओं का क्रम उपयोगिता की दृष्टि से होना चाहिए। पाठ्यक्रम की रचना करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बच्चों के लिए कौन - सा विषय अथवा कौन-सी क्रिया अधिक उपयोगी है। उदाहरण के तौर पर स्वतंत्र भारत में लोगों के आर्थिक जीवन को ऊपर उठाना बहुत आवश्यक है। इसलिए विज्ञान एवं तकनीकी के विषयों की वर्तमान युग में बहुत उपयोगिता है। इसे हर स्तर के पाठ्यक्रम में उपयुक्त स्थान देना होगा। इसी प्रकार लोकतंत्रात्मक देश में प्रत्येक बच्चे को अपनी मातृभाषा तथा राष्ट्रभाषा का ज्ञान आवश्यक होना चाहिए। उच्च चारित्रिक विकास के लिए नैतिक शिक्षा को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके बाद भौतिक सभ्यता की बात आती है, जिसके लिए व्यावसायिक शिक्षा की आवश्यकता होती है। अतः इसे दूसरे स्थान पर रखना चाहिए। शरीर तो सब धर्मों का साधन है, उसके बिना तो कोई कार्य पूरा नहीं किया जा सकता। अतः इसके विकास पर भी ध्यान देना चाहिए। इसी प्रकार शेष विषयों और क्रियाओं के लिए उनकी उपयोगिता की दृष्टि से ही समय निश्चित करना चाहिए।
(4) तत्परता का सिद्धान्त - वही ज्ञान प्रभावशाली तथा अर्थपूर्ण होता है, जिसके सीखने के लिए छात्र प्रेरित होता है या उसमें सीखने के प्रति तत्परता होती है।तत्परता के लिए आवश्यक है कि छात्र के पास उपयुक्त ज्ञान एवं कौशल हो और सीखने के प्रति उसका सकारात्मक दृष्टिकोण हो। इसके साथ-साथ वातावरण और विशेष ह्वप से विद्यालयी वातावरण भी अधिगम तत्परता को प्रभावित करता है।इसलिए पाठ्यक्रम की रचना ऐसे ढंग से की जानी चाहिए कि अध्यापक समय पर विषय पढ़ा सके।
(5) व्यापकता का सिद्धान्त - पाठ्यक्रम का निर्माण करते समय ध्यान रखा जाय कि यह शैक्षिक विषयों से संबंधित पाठ्य-पुस्तकों तक ही सीमित न रहे वरन् यह ऐसा होना चाहिए कि छात्रों की समस्त शैक्षिक वातावरण की अभिव्यक्ति कराने की क्षमता रखता हो और साथ में इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि छात्रों की भावनाओं को ठेस न पहुंचे। यह व्यवस्था ही छात्रों के दृष्टिकोण को व्यापक बनाने में सहायक सिद्ध हो सकती है।
(6) सह-संबंध या समवाय का सिद्धान्त - पाठ्यक्रम इस प्रकार आयोजित किया जाय कि इससे विभिन्न विषयों के समवायत या सह-संबंध ज्ञान की प्राप्ति हो।समवाय का सिद्धान्त इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि ज्ञान एक संपूर्ण इकाई है और इसे अलग-अलग टुकड़ों में प्रदान नहीं किया जा सकता। समवाय एकीकरण को ठोस बनाता है। अतः उत्तम सीखने के लिए यह आवश्यक है कि निजी स्तर के लिए पाठ्यक्रम तैयार करते समय उसमें उन्हीं विषयों और क्रियाओं को स्थान दिया जाए, जिनमें आपस में संबंध हो।विभिन्न विषयों की पाठ्य सामग्री ऐसी होनी चाहिए, जिसे एक दूसरे के आधार पर विकसित किया जा सके। इस प्रकार पाठ्यक्रम को कम समय तथा कम शक्ति लगाकर पूरा किया जा सकता है। समय और शक्ति का सदुपयोग और उत्तम सीखने की दृष्टि से इस सिद्धान्त का पालन करना आवश्यक है।
(7) सामुदायिक जीवन से सम्बन्ध का सिद्धान्त - माध्यमिक शिक्षा आयोग के अनुसार- “पाठ्यक्रम सामुदायिक जीवन से सजीव की और आंगिक रूप से संबंधित होना चाहिए। "
पाठ्यक्रम का सामुदायिक जीवन से स्पष्ट सम्बन्ध होना चाहिए। पाठ्यक्रम को इस जीवन को महत्त्वपूर्ण विशेषताओं की व्यवस्था करनी चाहिए और बालकों को इसकी कुछ महत्त्वपूर्ण क्रियाओं के सम्पर्क में लाना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि पाठ्यक्रम में उत्पादक कार्य को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह कार्य व्यवस्थित मानव जीवन का आधार है। इसके अतिरिक्त पाठ्यक्रम स्थानीय आवश्यकताओं और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाया जाना चाहिए।
(8) विषयों के पारस्परिक सम्बन्ध का सिद्धान्त - पाठ्यक्रम को अनेक असम्बन्धित विषयों में खण्डित नहीं करना चाहिए। ऐसा पाठ्यक्रम प्रभावहीन हो जाता है। सभी विषयों का एक-दूसरे से सम्बन्ध होना चाहिए और सभी का जीवन से सम्बन्ध होना चाहिए।
(9) अवकाश के लिए प्रशिक्षण का सिद्धान्त - माध्यमिक शिक्षा आयोग का कथन है- "पाठ्यक्रम इस प्रकार नियोजित किया जाना चाहिए कि वह छात्रों को न केवल कार्य के लिए, वरन् अवकाश के लिए भी प्रशिक्षित करें।"
इस प्रकार पाठ्यक्रम छात्रों को कार्य और अवकाश दोनों के लिए प्रशिक्षित करे।इसलिए अध्ययन के विषयों के साथ-साथ पाठ्यक्रम में अन्य क्रियाओं को भी स्थान दिया जाय; जैसे- खेल - कूद, सामाजिक और सौन्दर्यात्मक क्रियाएँ आदि। ये क्रियाएँ बालकों को अपने अवकाश का सदुपयोग करने के लिए प्रशिक्षित करेंगी।
(10) विकास की सतत् प्रक्रिया का सिद्धान्त - किसी भी पाठ्यक्रम का सदैव के लिए निर्माण नहीं किया जा सकता है। उसमें समय के साथ परिवर्तन किये जाने आवश्यक हैं। क्रो व क्रो का कथन है- " वैज्ञानिक प्रगति, नवीन व्यावसायिक अवसर, राष्ट्रों के अधिक विस्तृत अन्तर्सम्बन्ध, प्रगतिशील आदर्श तथा आकांक्षाएँ - यह माँग प्रस्तुत करती हैं कि शिक्षा के सिद्धान्त और व्यवहार को ज्ञान, कुशलता और दृष्टिकोण पर दिये जाने वाले विभिन्न प्रकार के अनुकूल बनाया जाए। "
(11) राष्ट्रीय लक्ष्यों एवं लोकतंत्रात्मक गुणों के विकास का सिद्धान्त - स्वतंत्र भारत ने अपने लक्ष्य निर्धारित किए हुए हैं। देश की समस्त शिक्षा प्रणाली का आधार राष्ट्रीय लक्ष्यों में है। पाठ्यक्रम की रचना करते समय राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक ज्ञान, कौशल एवं भावनाओं - का समावेश करना आवश्यक है। इसके अंतर्गत हमें अपने छात्रों को देश की समस्याओं से अवगत कराना चाहिए तथा उनके अंदर स्वतंत्र विचारधारा, तार्किक निर्णय करने की शक्ति तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विकसित करने के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करने चाहिए। लोकतन्त्रात्मक प्रणाली तभी सफल हो सकती है, जब शिक्षा के सभी पहलुओं में लोकतंत्र नजर आए। इसलिए पाठ्यक्रम में भी समानता, स्वतंत्रता, सहिष्णुता एवं सहयोग जैसे- लोकतांत्रिक मूल्यों के विकास के लिए विभिन्न क्रिया-कलापों का आयोजन कर व्यावहारिक रूप देने के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराने होंगे।
(12) परिपक्वता का सिद्धान्त - जैसे-जैसे विद्यार्थी बड़ा होता जाता है, उसकी रुचियों तथा दृष्टिकोणों में भी परिवर्तन होते जाते हैं। उदाहरण के लिए आरंभिक बाल्यकाल का समय आश्चर्य तथा रोमांस का होता है। इसलिए इस स्तर पर केवल उन्हीं विषयों तथा क्रियाओं को पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाना चाहिए, जिनमें रोमांचकारी घटनाओं के तत्व सम्मिलित हों। इसके पश्चात् विद्यार्थी व्यावहारिक वस्तुओं में रुचि रखते हैं। इसलिए निम्न माध्यमिक स्तर पर पाठ्यक्रम मैं व्यावहारिक समस्याओं का समावेश करना चाहिए।
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