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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2760
आईएसबीएन :0

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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर

अध्याय 15 - हिन्दी में पाठ्य सहगामी क्रियायें

प्रश्न- हिन्दी में पाठ्य सहगामी क्रियाओं का वर्णन कीजिए एवं इनकी सांस्कृतिक गतिविधियों एवं विशेषतायें बताइये।

उत्तर-

हिन्दी में पाठ्य सहगामी क्रियायें

हिन्दी में निम्नलिखित पाठ्य सहगामी क्रियायें है-

साहित्यिक गतिविधियाँ - साहित्यिक गतिविधियों से तात्पर्य उन क्रिया-कलापों से है जिनके माध्यम से साहित्य के रूप में कविता, कहानी, नाटक, निबन्ध, उपन्यास, समालोचना, रिपोर्ताज, डायरी तथा पत्र-पत्रिकाओं आदि के अध्ययन, अध्यापन, प्रचार-प्रसार शिक्षण तथा अभ्यास आदि का कार्य किया जाता है।

साहित्यिक गोष्ठियाँ, कवि सम्मेलन, साहित्यिक गतिविधियों के अन्तर्गत ही सम्मिलित किए जाते है। इनके अतिरिक्त राष्ट्रीय समारोहों तथा पर्व, उत्सव तथा सांस्कृतिक आयोजनों में किया जाने वाला कविता-पाठ, भाषण, वाद-विवाद, पुस्तक समीक्षा आदि भी साहित्यिक गतिविधियाँ कही जा सकती है।

उक्त समस्त गतिविधियों में शिक्षकों के कुशल निर्देशन से छात्रों में साहित्यिक अभिरुचि का विकास किया जा सकता है, जिससे वे जीवन को मात्र जीविका या अर्थोपार्जन का निमित्त न मानकर उसके कोमल रससिक्त मानवीय भावनाओं और संवेदनाओं से परिपूर्ण स्वरूप का विकास कर सकते है।

सांस्कृतिक गतिविधियाँ

सांस्कृतिक व साहित्यिक गतिविधियां लगभग समान ही है। दोनों में केवल इतना ही भेद है कि साहित्यिक कार्यक्रमों में साहित्य पर अधिक जोर रहता है जबकि सांस्कृतिक कार्यक्रम व्यापक होकर साहित्यिक क्रियाकलापों को अपने अंग के रूप में ग्रहण करते है। इस प्रकार सांस्कृतिक गतिविधियों का क्षेत्र साहित्यिक से कहीं अधिक विस्तृत हो जाता है। इन गतिविधियों द्वारा छात्रों का मनोरंजन होने के साथ-साथ उनके भाषागत ज्ञान तथा बहुविध क्रियाकलापों/कौशलों में भी पर्याप्त वृद्धि का विकास होता है।

शैक्षिक क्रियाएँ.

1. सेमिनार, सम्मेलन, गोष्ठियाँ आदि।

2. वाद-विवाद प्रतियोगिताएँ, भाषण, कहानी, कविता, नाटक, निबंध, लेखन, विद्यालय पत्रिका एवं वाचन आदि।

3. विद्यालय के विभिन्न विभागों को आम सभाएँ, परिषदें आदि।

मानसिक विकास सम्बन्धी क्रियाएँ - वाद-विवाद, साहित्य, लेखन, कविता-पाठ, अभिनय, साहित्य सभा आदि। समाचार पत्र वाचन; कक्षा कक्ष, छात्र क्लब, छात्र संसद, विभिन्न क्लब आदि का गठन एवं देखभाल; साहित्यिक समारोह जयन्तियों एवं प्रदर्शनियों।

कलात्मक गतिविधियाँ - संगीत, नृत्य स्थापत्य, शिल्प तथा काव्य आदि ललित कलाओं के कार्यक्रम तथा जो Point Last page में कट है।

खेलकूद व्यायाम सम्बन्धी कार्य - विभिन्न प्रकार के खेल उत्सवों का आयोजन व विभिन्न खेलों का प्रदर्शन, एन.सी.सी. स्काउट आदि का आयोजन, व्यायाम को सिखाया आदि।

शिल्प व वास्तुकला - भवन निर्माण, लकड़ी लोहे का कार्य वास्तु ज्ञान, सिलाई, कढ़ाई, मिट्टी के बर्तन बनाना, खिलौने बनाना, गत्ते आदि के शिल्प कार्य, पुस्तकों को जिल्प, धातु व प्लास्टिक के मॉडल आदि।

समाज-सेवा के कार्य - एन. एस. एस., प्रौढ़ शिक्षा, निरक्षरता उन्मूलन आदि। मलिन बस्तियों में सहायता कार्य रोगियों, शरणार्थियों की सहायता, ट्रैफिक व्यवस्था में सहायता करना।

पर्यटन - भ्रमण आदि सम्बन्धी कार्य - विभिन्न स्थानों का भ्रमण किसी विशेष संस्था का भ्रमण, सांइस सिटी, विज्ञान पार्क, संग्रहालय आदि का भ्रमण।

संवैधानिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह - सभी पर्वो में भाग लेना सभी महापुरुषों का जन्मदिन मनाना, अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव, धर्मनिरपेक्षता का कार्यक्रम करना।

मनोरंजक कार्यक्रम करना - उत्सव, मेले, प्रदर्शनी तथा रमणीय स्थान का भ्रमण, चिड़ियाघर, सर्कस आदि का भ्रमण।

शासन द्वारा निर्धारित कार्यक्रम - एन.सी.सी., स्काउट आदि मे भाग लेना, एन. एस. एस. व समाज सेवा आदि कार्यक्रम मे भाग लेना।

आकस्मिक कार्यों में योगदान - हादसा होने पर सहायता युद्ध आदि मे अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह।

सृजनात्मक गतिविधियाँ - सृजनात्मक गतिविधियों का स्वरूप व प्रकृति साहित्यिक व सांस्कृतिक गतिविधियों से भिन्न होती है। यद्यपि सृजनात्मक कार्य अन्ततः साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यों के अंग बनते है किन्तु उनकी रचना पद्धति बहुत कुछ वैयक्तिक विकास के सिद्धान्त पर आधारित होती है। यह गतिविधियाँ शिक्षा के 3 शाश्वत उद्देश्यों में से प्रथम उद्देश्य की पूर्ति करती है। अतः भाषा शिक्षण के अंतर्गत इनका महत्व बढ़ जाता है। मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों के अनुसार- प्रत्येक व्यक्ति के अंदर कुछ न कुछ विशिष्ट प्रतिभा अवश्य होती है। शिक्षक का यही कार्य है कि वह प्रत्येक छात्र की इस नैसर्गिक सृजनात्मक प्रतिभा का पता लगाकर उसका पूर्ण विकास करे।

पाठ्येत्तर गतिविधियों की आवश्यकता एवं महत्व - प्रत्येक विद्यालय में इनकी सुचारू रूप से चलाना चाहिए इन कार्यक्रमों का क्षेत्र इतना अधिक विस्तृत और व्यापक है कि इन्हें केवल प्रधानाचार्य, शिक्षकों व कर्मचारियों पर छोड़ देने से इनके साथ न्याय हो पाने की सम्भावना नहीं की जा सकती। अतः यह आवश्यक है कि उचित समय पर इनके विधिवत संचालन के लिए प्रबन्ध तंत्र को भी अपना भरपूर सहयोग प्रदान करना चाहिए।

पाठ्येत्तर क्रियाओं की विशेषताएँ

पाठ्येत्तर क्रियाओं की विशेषतायें निम्नलिखित है-

1. यह क्रियाकलापों पाठ्यचार्यों में निर्धारित विषय सामग्री से युक्त पाठ्य-पुस्तकों के अध्ययन के अतिरिक्त की जाने वाली गतिविधियाँ होती है।

2. ये गतिविधियाँ विद्यालय द्वारा आयोजित व प्रायोजित की जाती है।

3. इनके स्वरूप क्षेत्र समय, विधि आदि परिवर्तित व संशोधित होते रहते है।

4. इनकी गणना छात्रों के लिए निर्धारित शैक्षिक कार्यक्रम के अन्तर्गत ही की जाती है।

5. इनके माध्यम से कक्षा शिक्षण से प्राप्त अधिगम के स्थायी बनाया जा सकता हैं।

6. इनके द्वारा छात्रों को शिक्षा व समाज के मध्य अंतर्क्रिया के माध्यम से सामंजस्य बैठाने का अवसर प्राप्त होता है।

7. ये शिक्षा व समाज की परस्पर अन्योन्याश्रितता का विकास करती हैं तथा इनके द्वारा शिक्षा व समाज में समकलन स्थापित होता है।

8. यह छात्रों को कर के सीखने, अनुभव द्वारा सीखने तथा अभ्यास द्वारा सीखने के अवसर प्रदान करती है।

9. आधुनिक सूचना प्रौद्योगिक, कम्प्यूटर व शैक्षिक तकनीकी के प्रयोग मे इनकी उपयोगिता को और व्यापक बना दिया है।

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