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बीएड सेमेस्टर-2 तृतीय प्रश्नपत्र - शिक्षा के तकनीकी परिप्रेक्ष्य

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2758
आईएसबीएन :0

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बीएड सेमेस्टर-2 तृतीय प्रश्नपत्र - शिक्षा के तकनीकी परिप्रेक्ष्य - सरल प्रश्नोत्तर

 

अध्याय-14 निष्पत्ति प्रत्यय प्रतिमान, समूह अन्वेषण प्रतिमान, प्रगत संगठनात्मक प्रतिमान वाक्य संरचना के साथ

(Concept Attainment Model, Group Investigation Model, Advanced Organizer Model with its Syntax)

प्रश्न- निष्पत्ति प्रत्यय प्रतिमान तथा परिपृच्छा शिक्षण प्रतिमान की विस्तृत व्याख्या कीजिए।

अथवा
निष्पत्ति प्रत्यय प्रतिमान तथा परिपृच्छा शिक्षण प्रतिमान को बताते हुये इनके आधारभूत तत्वों की चर्चा कीजिए।

उत्तर-

निष्पत्ति प्रत्यय प्रतिमान
(Concept Attainment Model)

इस प्रतिमान का विकास सन् 1956 में जे०एस० ब्रुनर (J.S. Bruner), जे० गुड्रो (J. Goodrow) तथा जॉर्ज ऑस्टिन ने किया तथा इस प्रतिमान के उद्भव एवं विकास का कारण मानव में चिन्तन प्रक्रिया पर हुई विभिन्न अनुसंधान एवं खोजे हैं। इस प्रतिमान की मान्यता है कि प्रत्येक मानव में चिन्तन-शक्ति एवं सामर्थ्य होने के कारण वह अपने चारों ओर के वातावरण की जटिलता एवं दुरूता को समझता है, उसमें उपस्थित विभिन्न तत्वों का वर्गीकरण करता है, उसमें

उपस्थित विभिन्न तत्वों में समानता तथा असमानता व्याप्त करता है एवं इन विभिन्न प्रकार के कार्यों के माध्यम से वातावरण से तथ्यों का एकीकरण करते हुए वह सीखने की प्रक्रिया को पूर्ण करता है।

आसुबेलक तथा रॉबिन्सन के अनुसार - "प्रत्यय किसी विशिष्ट क्षेत्र में उन घटनाओं की ओर संकेत करता है जिन्हें विशिष्टताओं के आधार पर समूहबद्ध किया जाता है। ये विशेषतायें एक समूह के सदस्यों को दूसरे से विभेदित करती हैं।"

निष्पत्ति प्रत्यय प्रतिमान की व्याख्या इसके विभिन्न तत्वों के आधार पर निम्न प्रकार से की जा सकती है-

(1) उद्देश्य (Focus) - इस प्रतिमान द्वारा प्रमुख रूप से छात्रों में आगमन तर्क का विकास किया जाता है। छात्र या शिक्षार्थी वातावरण के विभिन्न वस्तुओं, व्यक्तियों या घटनाओं के मध्य परस्पर सहसम्बन्ध तथा विभिन्नता ज्ञात करने का प्रयास करते हैं जिससे उनमें आगमन तर्क का समुचित विकास होता है।

(2) संरचना (Syntax) - निष्पत्ति प्रत्यय प्रतिमान की संरचना निम्नलिखित चार सोपानों पर प्रमुख रूप से आधारित है-

1. सर्वप्रथम छात्रों के सम्मुख आँकड़ों को प्रस्तुत किया जाता है। ये आँकड़े चाहे किसी घटना से सम्बन्धित हों या किसी व्यक्ति से, छात्र इन आँकड़ों की सहायता से प्राप्त ज्ञान की इकाइयों को विभिन्न प्रत्ययों में परिसीमित करता है। इसके विकास में छात्र को पूर्ण पुनर्बलन प्रदान किया जाता है।

2. इस सोपान की शुरूआत प्रत्यय निष्पादन करने के लिए उपयुक्त नीतियों के विश्लेषण से होती है। कुछ छात्र जटिल से प्रारम्भ करके सरल प्रत्यय का या सामान्य से प्रारम्भ करके विशिष्ट प्रत्यय का निर्माण करते हैं।

3. तृतीय सोपान के अन्तर्गत छात्र अपनी आयु एवं अनुभव के आधार पर विभिन्न प्रकार के प्रत्ययों एवं अनेक गुणों का विश्लेषण करता है। प्रत्ययों को विकसित करने की जटिलता छात्र की आयु के साथ-साथ बढ़ती जाती है। इस सोपान का मुख्य उद्देश्य प्रत्यय के स्वरूप और उसके उपयोग के विषय में रस की अभिवृद्धि करना है।

4. अन्तिम सोपान में छात्र उपयुक्त प्रत्ययों को अपनाते हैं तथा दूसरे छात्रों को बताते हैं। इसके लिए प्रत्यय खेल का सहारा भी लिया जा सकता है। यह सोपान छात्रों को प्रबल निर्माण की प्रविधि से परिचित कराने में सहायक होता है।

(3) सामाजिक प्रणाली (Social System) - निष्पत्ति प्रत्यय प्रतिमान में शिक्षण एवं अधिगम का मुख्य आधार शिक्षक होता है। शिक्षक को छात्रों की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त होता है क्योंकि वह तथ्य प्रस्तुत करता है, योजना बनाता है तथा छात्रों को निर्देशित करता है। इस सम्पूर्ण शिक्षक व्यवहार का प्रमुख उद्देश्य छात्रों को प्रत्यय निर्माण में सहायता प्रदान करना है। शिक्षक ही छात्रों के सम्मुख उपयुक्त वातावरण का निर्माण करता है।

(4) मूल्यांकन प्रणाली (Support System) - इस प्रतिमान के अन्तर्गत छात्रों के सम्मुख प्रत्यय निर्माण के लिए आवश्यक एवं उपयुक्त सामग्री का होना आवश्यक है । यह सामग्री छात्रों के सम्मुख सकारात्मक या नकारात्मक किसी भी रूप में हो सकती है जिसके आधार पर छात्र तथ्य एकत्रित करके प्रत्यय का निर्माण करते हैं। इसमें निबन्धात्मक तथा वस्तुनिष्ठ दोनों प्रकार से मूल्यांकन किया जाता है।

परिपृच्छा शिक्षण प्रतिमान
(Inquiry Training Model)

इस प्रतिमान के मुख्य प्रवर्तक रिचर्ड सचमैन (Richard Suchman) हैं। सचमैन का मुख्य बल पुष्ट आधार वाले ज्ञान के लिए शिक्षण न होकर उस तरीके या साधन के शिक्षण से है जिसके द्वारा प्रत्यय निर्माण घटनाओं की व्याख्या हेतु सिद्धान्तों का निरूपण तथा तथ्यों की पुष्टि करने में सहायता मिलती है। इस शिक्षण विधि का मुख्य उद्देश्य न तो सिद्धान्तों को बनाना है न ही समस्या का समाधान प्रस्तुत करना है।

सचमैन के शब्दों में, "पृच्छा अर्थ का विश्वास है और वह किसी एक विशेष के चेतन अवस्था के विभिन्न पहलुओं में एवं उनके मध्य एक नयी सम्बद्धता के पाने की इच्छा से प्रेरित होती है।"

"Inquiry is the pursuit of meaning and thus it is motivated by the desire to obtain a new leval to relatedness between and among seprate aspect of ones consciousness." -Suchman

परिपृच्छा शिक्षण प्रतिमान का अध्ययन इसके विभिन्न तत्वों के आधार पर किया जा सकता है-

1. उद्देश्य (Focus) - इस प्रतिमान का मुख्य उद्देश्य है-

(अ) सामाजिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए व्यक्तिगत क्षमताओं का विकास करना तथा

(ब) वैज्ञानिक पृच्छा की नीतियों एवं युक्तियों का विकास करना।

उद्देश्यों के तौर पर देखने पर यह ज्ञात होता है कि सचमैन के प्रतिमान का मुख्य उद्देश्य पुष्ट आधार वाला (Substentive) ज्ञान का शिक्षण न होकर तरीके का शिक्षण है जिसके माध्यम से उस ज्ञान को विकसित किया गया है।

2. संरचना (Syntex) - इस प्रतिमान की संरचना व्यवस्था का वर्णन इसमें दी जाने वाली अनुदेशन सहायता की मात्रा एवं प्रकृति की ओर संकेत करता है। इस प्रतिमान में शिक्षण काल लगभग एक घण्टा है और सम्पूर्ण शिक्षण काल निम्नलिखित तीन सोपानों में विभक्त है-

(अ) समस्या का प्रस्तुतीकरण एवं पहचानना - इस पद में शिक्षक इस प्रकार की समस्या का चयन शिक्षण हेतु करता है जिसमें विद्यार्थी निष्क्रिय न रहकर सक्रिय कार्य करे। इस समस्या. का चयन क्योंकि छात्रों के मानसिक स्तर, पूर्ण ज्ञान तथा उनकी रुचि को ध्यान में रखकर किया जाता है, अतः छात्र अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिए स्वयं प्रयासशील रहते हुए समस्या का हल प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

(ब) समस्या सम्बन्धी प्रयोग करना - इस सोपान में छात्र लगभग 30 मिनट तक समस्या से सम्बन्धित सूचना प्राप्त करने या पुष्टीकरण करने वाले प्रश्न पूछता है तथा शिक्षक उसका स्तर केवल हाँ या नहीं में देने तक ही सीमित रखता है तथा कुछ प्रश्नों कों जिसके माध्यम से समस्या 'के समाधान की सम्भावना होती है, पूछने से मना भी कर सकता है। यह सोपान उस समय समाप्त होता है जब छात्र या तो देखे जाने वाली घटनाओं के स्पष्टीकरण पर पहुँच जाता है या समय समाप्त हो जाता है।

(स) छात्र व शिक्षक की समस्या समाधान के लिए नीति निर्माण - इसमें शिक्षक छात्रों द्वारा समस्या समाधान के दौरान प्रयुक्त युक्तियों एवं नीतियों का मूल्यांकन एवं पुनर्निरीक्षण करता है तथा उनके प्रश्नों को सुधारने के लिए विभिन्न सुझाव प्रस्तुत करने का प्रयास करता है।

3. प्रतिक्रिया सिद्धान्त - इसमें छात्रों के सम्मुख समस्या निवारण हेतु परिस्थितियाँ प्रस्तुत करनी चाहिए और उनकी तार्किक क्षमता, जिज्ञासा एवं स्वयं निर्णय लेने की क्षमता का विकास करना चाहिए। समस्या प्रस्तुतीकरण के पश्चात् छात्रों को परिपृच्छा का अवसर देना चाहिए। छात्रों की समस्या हल के लिए सभी सूचनायें और सुविधाएँ उपलब्ध करानी चाहिए तथा स्वयं उत्तर नहीं बताना चाहिए।

4. सामाजिक प्रणाली - सामाजिक प्रणाली के अन्तर्गत शिक्षक इस बात पर बल देता है कि विद्यार्थी स्वयं अपनी जिज्ञासाओं तथा ज्ञान प्राप्त करने में उपस्थित होने वाली समस्याओं के निराकरण हेतु योजनाओं का निर्माण करें। समस्या निवारण हेतु परिपृच्छा काल में विद्यार्थियों के परस्पर सहयोग को प्रोत्साहित करना चाहिए। कक्षा में उपलब्ध सभी साधन एवं सामग्री के साथ उन्हें स्वतन्त्रतापूर्वक सभी सिद्धान्तों का परीक्षण करने देना चाहिए।

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