बी ए - एम ए >> बीए सेमेस्टर-4 चित्रकला बीए सेमेस्टर-4 चित्रकलासरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीए सेमेस्टर-4 चित्रकला - सरल प्रश्नोत्तर
अध्याय - 1
सौन्दर्य, कला और दर्शन
(Aesthetics, Arts and Philosophy)
प्रश्न- कला क्या है? कला का अर्थ स्पष्ट कीजिये।
अथवा
कला का क्या अर्थ है? समझाइये।
उत्तर-
कला एक सार्वभौमिक मानवीय क्रिया है जो हर युग, हर स्थान हर समय में पाई जाती है चाहे वह अभिव्यक्ति के रूप में हो, सम्प्रेषण के रूप में या मनोरंजन के रूप में। किसी भी जीवित और जीवन्त सभ्यता में कला उस सभ्यता के विकास और पूर्णता का अनिवार्य मूलभूत अंग है। कला को समाज और संस्कृति से कभी अलग नहीं किया जा सकता। उसने अपने अस्तित्व को समझने की चेष्टा की। इसी उत्कंठा से सम्पूर्ण दर्शन और विज्ञान, कला और संस्कृति, सर्वत्र मूल्यवान वस्तुओं का जन्म हुआ।
कला का समाजशास्त्रीय अध्ययन, समाज में कला के केन्द्रीय स्थान, क्रिया एवं अर्थ को स्पष्ट करता है। सभ्यता के सम्पूर्ण विकास, उसके कलात्मक पक्ष का, अलग युगों में भिन्न देशों में अध्ययन, अत्यन्त लाभदायक अध्ययन है।
कला के अन्दर जीवन के मूल तत्व निहित हैं। इसमें कल्पना, आदर्श, प्राचीन परम्पराएं और सृजनशीलता छिपी है। भारतीय वांग्डमय में शब्द 'कला' का पहला प्रयोग ऋग्वेद में मिलता है। तत्पश्चात् शत्पथ ब्राह्मण, तेत्रीय, ब्राह्मण, अरणायक और अथर्ववेद में भी कला का प्रयोग हुआ। यहाँ पर यह ध्यान देने की आवश्यकता है कि यूनानियों की भाँति कला का उपयोग शिल्प के रूप में कभी नहीं पाया गया, भारतीय अवधारणा दर्शन के अधिक निकट रही, लौकिक के नहीं।
कला का शाब्दिक अर्थ - कला संस्कृत शब्द है, इसके उद्भव पर संस्कृत विद्वानों में मतभेद है। ये मत निम्न हैं
'शब्द 'कला' 'ला' धातु से लिया, उसमें 'क' जोडा। ला = देना, क = सुख, 'कामं लाति इति कला जो आनन्द देती है वही कला है।
डा. सीताराम चतुर्वेदी (काशी 2010 वि.) के अनुसार - भी कला का मान्य अर्थ है के आनन्दं लाति इति कला।
कला का अर्थ - कौशल या प्रवीणता है। पाश्चात्य साहित्य व सौन्दर्यशास्त्र में कला का समानार्थी शब्द 'आर्ट' (Art) है, जो लैटिन भाषा के आर्स (Art) शब्द से उत्पन्न हुआ, जो आनन्द दे, वही कला है।
कुछ विद्वान 'कला' शब्द के निरूपण में कला का उद्भव 'कल' धातु से मानते हैं। जिसका शाब्दिक अर्थ है प्रेरित करना - कला प्रेरित क्रिया है।
आज जिस रूप में कला शब्द का प्रयोग होता है उस रूप में भरतमुनि ने सर्वप्रथम इस शब्द का प्रयोग किया था। इस अर्थ में कला में सभी ललित कलाएं चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत
कला, गायन, वाद्य, काव्य, नृत्य आते हैं। यूरोप में सबसे पहले प्लेटो ने कलाओं को ललित कला और उपयोगी कला के दो वर्गों में बांटा था। अनुकरण वाली कला और कुछ बनाने वाली कला।
शिक्षा की दृष्टि से कला के दो वर्ग हैं-
(1) व्यावसायिक कलाएं (Vocational Arts) - रंगना, छापना, बढ़ई।
(2) उदार कलाएं (Liberal Arts) - संगीत, व्याकरण, तर्क, शिक्षा आदि।
विलियम ने - वात्स्यायन के कामसूत्र में दी चौंसठ कलाओं को दो वर्गों में विभक्त किया
(1) बाह्य या प्रकट कलाएं चित् - रकला, मूर्तिकला, बढ़ई, सुनार, भवन निर्माण इत्यादि।
(2) आन्तरिक या निजी कलाएं - जो व्यक्ति की स्वयं की हों जैसे कला, शृगांर आदि।
कला का भारतीय वर्गीकरण-
भरतमुनि के अनुसार - ललित कला, काव्यमयी सुख देने वाली, शिल्प कला, उपयोगी कलाएं।
पाणिनी के अनुसार - शब्द शिल्प ललित कला व शिल्प कला दोनों के लिए प्रयोग किया, कोई क्रिया जो वस्तु को सुन्दर बना दे, वही कला है।
वात्स्यायन के 'अनुसार चौंसठ कलाएं मानी गई हैं ये अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति में सहायक हैं।
कला के दो वर्ग -
(1) अपरा कला - जो सीमाओं में बँधी है।
(2) पराकला - जो सीमाओं से मुक्त है जैसे आध्यात्मिक सौन्दर्य का आनन्द।
शुक्रनीति - मूक भी जिसका रसास्वादन कर ले, वह कला है।
इस प्रकार भारतीय अवधारणा के अनुसार-
कला परमब्रह्म को निराकार से साकार रूप में लाने का साधन है।
व्यक्ति के मन में छिपी रूप सौन्दर्य की राशि को किसी भी रूप में आकार में बाहर अभिव्यक्त करना, कला है।
कला सत् + चित् + आनन्द का योग है।
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