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बी एड - एम एड >> बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाजसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज
अध्याय 8 - धर्म, जाति, वर्ग एवं गरीबी के साथ लैंगिक प्रतिच्छेदन
[Gender and its intersection with poverty, class, caste and religion]
प्रश्न- हमारे देश में महिलाओं की स्थिति में सुधार कब से हुआ? आज भी स्त्री की क्या दशा है?
लघु उत्तरीय प्रश्न
- हमारे देश में आज भी कौन निम्न दशा में जीवन यापन करने के लिए बाध्य है?
- महिलाएँ आज भी किस प्रकार की हिंसा झेलने को विवश हैं?
उत्तर-
हमारे देश में आज़ादी के बाद से महिलाओं की स्थिति में कुछ सुधार हुआ है, पर वे अभी भी पुरुषों से काफ़ी पीछे हैं। हमारा समाज अभी भी पितृसत्तात्मक है। औरतों के साथ अभी भी कई तरह के भेदभाव होते हैं, उनका दमन होता है—
- महिलाओं की साक्षरता दर अब भी मात्र 54 प्रतिशत है जबकि पुरुषों में 76 प्रतिशत। कुछ कारण स्कूल जाने वाली लड़कियों की एक सीमित संख्या ही उच्च शिक्षा को प्राप्त कर पाती है। इसका सबसे बड़ा कारण पारिवारिक निर्णय और परंपराएँ हैं। यदि बच्चे की शिक्षा के लिए खर्च करने की नौबत आए तो माता-पिता अधिकांशतः लड़कियों की शिक्षा पर निवेश करना उचित नहीं समझते और उन्हें प्राथमिक शिक्षा के दरवाजे पर ही रोक देते हैं। क्योंकि माँ-बाप अपने संसाधनों को लड़के-लड़की दोनों पर बराबर खर्च करने के बजाय लड़कों पर ज्यादा खर्च करना पसंद करते हैं।
- इस स्थिति के चलते अब भी उच्च तनख्वाह वाले और ऊँचे पदों पर पहुँचने वाली महिलाओं की संख्या बहुत ही कम है। भारत में औसतन एक स्त्री एक पुरुष की तुलना में रोज़ाना एक घंटा ज़्यादा काम करती है पर उसको ज़्यादातर काम के लिए पैसे नहीं मिलते इसलिए अवसर कम होते हैं, मूल्यांकन सही नहीं किया जाता।
- समान मजदूरी से संबंधित अधिनियम में कहा गया है कि समान काम के लिए समान मजदूरी दी जाएगी। घरहन, काम के हर क्षेत्र में यानी खेल-कूद की दुनिया से लेकर सिनेमा के संसार तक और कला-कारखानों से लेकर खेत-खलिहान तक महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मज़दूरी मिलती है, भले ही दोनों ने समान काम किया हो।
- भारत के अनेक हिस्सों में माँ-बाप को सिर्फ़ लड़के चाहिए होते हैं। लड़कों का जन्म लेने से पहले ही खत्म कर देने के तरीके इसी मानसिकता से उपजे हैं। इससे देश का लिंग अनुपात (प्रति हज़ार लड़कों पर लड़कियों की संख्या) गिरकर 919 पर गया है। किए गए शोध कार्य यह दिखाते हैं कि कुछ जगहों पर यह अनुपात गिरकर 850 और कहीं-कहीं तो 800 से भी नीचे चला गया है। महिलाओं के उत्पीड़न, शोषण और उन पर होने वाली हिंसा की खबरें हमें रोज़ पढ़ने को मिलती हैं। शहरी इलाके तो महिलाओं के लिए ख़ास तौर से असुरक्षित हैं। वे अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि वहाँ भी उन्हें मारपीट तथा अनेक तरह की घरेलू हिंसा झेलनी पड़ती है।
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