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बी ए - एम ए >> चित्रलेखा

चित्रलेखा

भगवती चरण वर्मा

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :128
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 19
आईएसबीएन :978812671766

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बी.ए.-II, हिन्दी साहित्य प्रश्नपत्र-II के नवीनतम पाठ्यक्रमानुसार पाठ्य-पुस्तक

प्रश्न- "विश्वविद्यालय स्वायत्त संस्थायें हैं।' इस कथन पर टिप्पणी कीजिए।
अथवा
"विश्वविद्यालय पर संक्षिप्त टिप्पणी दीजिए।
उत्तर-
भारतीय विश्वविद्यालयों को स्वायत्त संस्था इसलिए माना जाता है क्योंकि उन पर न तो केन्द्र सरकार का नियंत्रण है और न राज्य सरकार का ही। विश्वविद्यालय का प्रशासन और संचालन पूर्णतः पृथक है। यद्यपि सरकार पर विश्वविद्यालयों के लिए अनेक नियमों एवं शर्तों के दर्शन जरूर होते हैं, किन्तु उनसे उनकी स्वायत्तता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। शिक्षा मंत्रालय विश्वविद्यालयों को निर्देश भेजता है, उन्हें बताता है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं, किन्तु इसे हस्तक्षेप के रूप में नहीं समझा जाता है। इसीलिए यह कहा जाता है कि विश्वविद्यालय स्वायत्त संस्थाएँ हैं।
विश्वविद्यालय की स्वायत्ततता के सन्दर्भ में डॉ. सी.पी. रामास्वामी नायर, 'सदस्य, विश्वविद्यालय स्वायत्तता, समिति ने घोषित किया - "इस सर्वस्वीकृत धारण के नाते कि विश्वविद्यालय समाज को बौद्धिक नेतृत्व प्रदान करते हैं और विश्वविद्यालय सामाजिक तथा आर्थिक प्रगति की कुंजी है, यह तथ्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि विश्वविद्यालयों को बाहरी दबावों से निर्विघ बने रहकर अपने व्यक्तित्व का विकास व उत्थान करने देने में सहायता पहुँचाई जाए। देश की प्रगति का हित देखते हुए कार्य संचालन तथा विकास के यथासम्भव अधिकतम स्वायत्तता अनिवार्य है और यह भी अपरिहार्य है कि इस लक्ष्य के प्रतिकूल रहने वाली प्रवृत्तियों की ओर ध्यान आकृष्ट किया जाए तथा प्रभावी ढंग से उनका विरोध किया जाये। विश्वविद्यालय की स्वायत्ता से अभिप्राय उनके कार्यों में हस्तक्षेप न करने से है विश्वविद्यालय का मुख्य दायित्व उच्च ज्ञान का प्रसार करना और विभिन्न क्षेत्रों में मौलिक अनुसन्धान को प्रोत्साहन प्रदान करना है। सत्य की निर्भयता पूर्ण खोज करने के लिए विचारों और कार्यों की स्वतंत्रता भी आवश्यक है। यह स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए विश्वविद्यालयों को अपना कार्य करने की पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिए।
विश्वविद्यालयों की स्वायत्ता दो प्रकार की होती है - (i) आन्तरिक स्वायत्तता एवं (ii) वाह्य स्वायत्ता। विश्वविद्यालय की आन्तरिक स्वायत्ता का अर्थ है- विश्वविद्यालय के विभिन्न शैक्षिक एवं प्रशासनिक निकायों का संगठन एवं कार्य लोकतन्त्रीय आधार पर हों और सत्ता का विकेन्द्रीकरण हो। प्रशासन का दायित्व विशेषतः उन व्यक्तियों पर हो जिनका विश्वविद्यालय शिक्षा से पुराना एवं गहरा सम्बन्ध रहा हो और जिनकी सत्यता, ईमानदारी एवं लगन में पूर्ण विश्वास हो। विश्वविद्यालयों के लिए यह भी आवश्यक है कि विभिन्न विभागों एवं सम्बद्ध कालेजों को भी पर्याप्त स्वतन्त्रता एवं स्वाधीनता प्राप्त हो। - जबकि विश्वविद्यालयों की वाहय स्वायत्तता का अर्थ है विश्वविद्यालयों का केन्द्र व राज्य सरकार, राजनैतिक दल, सामुदायिक परिस्थितियों आदि के प्रभावों एवं नियन्त्रणों से मुक्त रहना। सिद्धान्त रूप में विश्वविद्यालयों को स्वायत्ता प्रदान करना तो सम्भव है, किन्तु व्यवहारिक दृष्टिकोण से यह स्वतंत्रता सम्भव नहीं, क्योंकि विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेने वाले छात्रों की संख्या में कितनी वृद्धि की जाय, पाठ्यक्रम के स्वरूप एवं आकार में क्या परिवर्तन किया जाए, विश्वविद्यालय में किन संकायों का विकास किया जाय शिक्षकों के वेतन स्तर मान आदि में कितनी वृद्धि की जाय, पाठ्यक्रम के स्वरूप पर ध्यान दिया जाए, शिक्षा की अवधि को स्थिर रखा जाए या बढ़ाया जाय, किन क्षेत्रों में अनुसंधान कार्य किया जाय आदि सभी विषय राष्ट्रीय स्तर के हैं।
स्वायत्ता प्रायः अव्यवस्था एवं दूषित प्रशासन के प्रति डा. सी. डी. देशमुख के विचार उत्तरदायी होती है। ऐसा नियंत्रण के आभाव में होता है। कुछ विश्वविद्यालय तो राजनीतिक दलबन्दी के अखाडे बन गये हैं। इसके अतिरिक्त केन्द्र व राज्य सरकार को यह भी चाहिए कि वे अपने पास अधिकार सुरक्षित रखे जिससे विश्वविद्यालयों को दिये गये वित्तीय अनुदान का दुरूपयोग न हो। साथ ही विश्वविद्यालयों को इस परिवर्तन-शील समाज की अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए समय की माँग को स्वीकार करना चाहिए तभी उनकी स्वायत्ता अक्षुण्णा रह पायेगी।

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